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तो इस बार भी किसानों की फीकी रहेगी होली...

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ऐसे तो इस बार भी फीकी
रहेगी किसानों की होली
नौ चीनी मिलों ने 9.27 अरब से अधिक गन्ना मूल्य दबाया
- शादी, अन्य कामकाज तो दूर घर का खर्च चलाना भी हुआ मुश्किल
- बजाज की गोला, पलिया, खंभारखेड़ा पर सबसे अधिक 6.31 अरब बकाया
अमित गुप्ता
लखीमपुर खीरी।
पिछले कई सालों से गन्ना मूल्य भुगतान समय पर न मिलने से परेशान किसानों को इस बार भी राहत नहीं मिल पाई है। कारण है कि सभी नौ चीनी मिलों ने किसानों का नौ अरब 27 करोड़ 43 लाख 46 हजार रुपये (14 दिन से पूर्व) गन्ना मूल्य दबा रखा है। भुगतान न मिलने से किसानों के लिए अपने परिवार की जरूरतें पूरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
सबसे ज्यादा बजाज ग्रुप की गोला, पलिया और खंभारखेड़ा मिलों ने छह अरब 31 करोड़ 86 लाख 72 हजार रुपये दबा रखे हैं। गोला मिल ने 14 दिसंबर 2017 के बाद से गन्ना मूल्य का भुगतान नहीं किया है। पलिया मिल ने 27 नवंबर 2017 और खंभारखेड़ा ने 11 दिसंबर 2017 के बाद खरीदे गन्ना मूल्य का भुगतान नहीं किया है। इसी तरह ऐरा मिल पर भी किसानों की बकाएदारी बढ़ती जा रही है। ऐरा मिल ने 25 दिसंबर 2017 के बाद से भुगतान नहीं किया है। अजबापुर मिल ने छह फरवरी 2018, कुंभी ने तीन फरवरी 2018, गुलरिया ने तीन फरवरी 2018, बेलरायां ने 16 जनवरी और संपूर्णानगर मिल ने सात जनवरी 2018 तक खरीदे गन्ना मूल्य का भुगतान किया है।
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किसानों का बकाया गन्ना मूल्य भुगतान न करने वाली सभी मिलों को नोटिस भेजा गया है। जल्द भुगतान कराने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उच्चाधिकारियों को भी रिपोर्ट भेजी गई है, जिनके निर्देशानुसार कार्रवाई की जाएगी।
- ब्रजेश कुमार पटेल, जिला गन्ना अधिकारी

शादी के लिए भुगतान पाने
को गिड़गिड़ा रहे किसान
- बैंक और साहूकारों से भारी ब्याज पर कर्ज लेना हुआ मजबूरी
अमर उजाला ब्यूरो
खमरिया।
किसानों के आर्थिक हालात सुधारने को लेकर सरकारों के प्रयास चीनी मिल प्रबंधन के आगे दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। बेटे-बेटियों की शादी के लिए किसानों को उनकी उपज का मूल्य नहीं मिल रहा है। शादी का कार्ड लेकर किसान अधिकारियों के चक्कर लगाकर बेहाल है। होली पर जरूरतों को पूरा करने के लिए किसान बैंक या साहूकारों से कर्जा लेने को मजबूर हैं।
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किसानों की प्रमुख नगदी फसल गन्ना है। नई सरकारी नीतियों, तकनीक और मेहनत से लगातार उत्पादन बढ़ाकर किसानों ने आर्थिक स्तर सुधारने की लगातार कोशिश की है, लेकिन मिल प्रबंधन के अडियल रवैये के आगे किसानों और सरकारों के प्रयास दम तोड़ रहे हैं। किसान अपनी फसल की आपूर्ति और भुगतान समय पर नहीं पाता है, जिससे लगातार उसकी आर्थिक स्थिति बद्तर होती जा रही है। किसान दैनिक जरूरतों के साथ शादी के खर्च गन्ना भुगतान पर ही तय करता है, लेकिन मिल के अधिकारी निजी स्वार्थों के चलते धीरे-धीरे किसानों का अरबों रुपये दबाते जा रहे हैं। इससे किसानों को बैंक और साहूकारों से कर्जा लेना पड़ रहा है। चीनी मिलें किसानों को ब्याज नहीं देती हैं, लेकिन किसानों को ब्याज चुकाना पड़ता है।
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