गोला गोकर्णनाथ (लखीमपुर खीरी)। शैव और वैष्णव संप्रदाय के संतों में मतभेद प्राचीन काल से चले आ रहे हैं किंतु छोटी काशी में विशाल टीले पर शैव और वैष्णव संतों की अद्भुत तपोस्थली है। यहां तंत्रशास्त्र पर आधारित त्रिलोकीनाथ शिव मंदिर स्थित है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
नगर के भूतनाथ और लक्ष्मणयती जाने वाले मार्ग पर एक ऊंचे टीले पर वैष्णव संत बाबा द्वारिकादास का आश्रम था, बाबाजी सिद्ध संत थे। उनके आश्रम में ही शैव संप्रदाय के संत त्रिलोकगिरि ने भी अपना स्थान बना रखा था। त्रिलोक गिरि ने यहां पर तंत्रशास्त्र पर आधारित एक शिव मंदिर की स्थापना की, जो त्रिलोकीनाथ शिवालय के नाम से विख्यात हुआ।
बाबा जी इस शिव मंदिर में तंत्र साधना करते थे। वह सिद्ध तांत्रिक थे। तंत्र-मंत्र से परेशान और बीमारों की समस्याओं का निराकरण करते थे। वह चिड़ियों की बोली समझते थे। बाबा द्वारिका दास के आश्रम के पास ही पद्य पुराण वर्णित भद्र कुंड है, इस तीर्थ में ही बाबा ही रोज स्नान कर भगवान नारायण की पूजा करते थे। उनके स्वर्गवास के बाद बाबा जी को इस स्थान पर ही समाधिस्त किया गया। उनके बाद बाबा त्रिलोक गिरि ने काफी समय तक पूजा अर्चना की, बाद में उन्होंने इसी स्थान पर जीवित समाधि ले ली। वह आज भी जीवंत बताए जाते हैं।
मान्यता है कि इस स्थान पर सच्चे मन से की गई कामना अवश्य पूरी होती है। इस लिए यहां पर भक्तों का मेला लगा रहता है। भक्त बाबा द्वारिका दास की समाधि पर फूल और प्रसाद अर्पित करते हैं तो त्रिलोक गिरि की समाधि पर फूलों के साथ भांग और मदिरा चढ़ाते हैं। यहां हनुमानजी, दुर्गाजी के मंदिर भी हैं। यह स्थल पर्यटन की दृष्ट से अत्यंत सुंदर है। पहले यहां पर चंदन के वृक्ष लगे थे जो चोरों की निगाह से नहीं बच पाए। यहां विभिन्न प्रकार के फूलों के अलावा बेल, मीठा नीम, पाकड़, बरगद, पीपल आदि के वृक्ष वातावरण को रमणीय बनाते हैं।