कार्तिक मेला के लिए सज गया गांजर का ठुठवा घाट
खमरिया। ईसानगर विकास खंड में घाघरा तट पर लगने वाले कार्तिक पूर्णिमा के मेले में अवध के गांजर की सांस्कृतिक विरासत की झलक आज भी देखने को मिलती है। 400 साल पहले इस ठुठवा मेला को जांगड़ा राजा ने आम जनता के मिलने का माध्यम बनाया था। समय के साथ राजशाही खत्म हो गई। अब यह मेला राजनीतिक जनप्रतिनिधियों सेे मिलने का जरिया है। यह मेला घरेलू उपयोग के लकड़ी के सामान रसोईघर, खेेती किसानी सहित दैनिक उपयोगी वस्तुओं की खरीद फरोख्त का केंद्र है।
ईसानगर स्टेट के जांगड़ा राजा ने कराई थी शुरुआत
उपलब्ध इतिहास के अनुसार 400 साल पहले ईसानगर स्टेट के तत्कालीन जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने इस मेले की शुरुआत की। राज परिवार नेे बताया दशहरे पर शस्त्र पूजन के बाद राजपरिवार के लोग शिकार के लिए चले जाते थे। दीपावली पर शिकार से वापस आकर महल में पूजन के बाद राजा घाघरा नदी के किनारे शिविर लगाकर 15 दिनों तक आम जनता से मिलतेेे जुलते थे। इस दौरान पारंपरिक दंगल कुश्ती, घुड़सवारी, खेल, तमाशा, नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों के साथ धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम चलता था। जिसके चलते आसपास के कई जिलों से लोग अपनी दुकानें भी लगा लेते थे। जो एक बड़े मेले के स्वरूप में परिवर्तित हो जाता था। राजा रंजीत सिंह के बाद उनके वंशजों राजा भुवनेश्वरी प्रताप सिंह, राजा राजेंद्र सिंह, राजा इंद्र बहादुर सिंह, राजा रघुराज प्रताप सिंह आदि ने इस मेले को बुलंदियों तक पहुंचाया।
ठुठवा गांव पर लगने से कहा जाता है ठुठवा मेला
ठुठवा गांव के निकट लगने के कारण यह मेला ठुठवा मेले के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। घाघरा नदी के तट पर लगने के कारण इसी घाट के मेले के नाम से जाना जाता है। कहावत के अनुसार अपनी स्टेट को घाघरा के प्रकोप से बचाने के लिए राजा रंजीत सिंह ने देवोत्थानी एकादशी के दिन घाघरा को मनाने के लिए धार्मिक अनुष्ठान किया। तभी से यहां देवोत्थानी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक मेेेला लगने लगा।
हलवाई तय करते हैं मेले का स्थान
मेले मेें मिठाइयों की दुकान लगाने वाले हलवाई मेले का स्थान निश्चित करते हैं। यह पंरपरा काफी पहले से चली आ रही है। प्रशासन मेले से पहले हलवाइयों की बैठक बुलाकर उनसे स्थान के बारे में परामर्श करता है। इसके बाद देवोत्थानी एकादशी से मेला लगाना शुरू होता है। पहले यह मेला 15 दिन तक चलता था अब यह सात दिनों में ही सिमट कर ही रह गया है।
राजनीतिक पार्टियों के सजते हैं पांडाल
राजशाही खत्म होने के बाद धीरे धीरे जनप्रतिनिधियों ने सुदूर ग्रामीण अंचलों के गांव की आम जनता से मिलने के लिए इस मेले में अपनी अपनी पार्टियों के पंडाल लगाकर मिलने लगे। जिसके चलते आज जनप्रतिनिधियों से आम जनता के मिलने का माध्यम बन गया। मेले को राजनीतिक पार्टियों के क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने पंडालों में भीड़ के आधार पर अपने राजनैतिक जन बल की ताकत का अखाड़ा बना लिया।
चाक चौबंद रहती है सुरक्षा व्यवस्था
ईसानगर थाना क्षेत्र में लगने वाले इस मेले में प्रशासन व पुलिस अपना पंडाल लगाकर मेले की व्यवस्थाओं सुरक्षा पर पैनी नजर रखता है। प्रशासन आने वाली भीड़ और मेले के दुकानदारों की सुरक्षा के लिए पुलिस बल के साथ पीएसी बल, फायर ब्रिगेड के दस्ते को भी तैनात करता है।
साधू संत यहां करते है कल्पवास
धार्मिक आस्थावान और साधू संत पूर्व में 15 दिनों का नदी किनारे कल्पवास करते थे। अब देवोत्थानी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक नदी किनारे धार्मिक अनुष्ठान, सामूहिक भंडारे के साथ कल्पवास करते हैं।