पडरौना। कुशीनगर जिले में सिंचाई के सबसे बड़े स्रोत गंडक नहर प्रणाली में 15 जून से पहले पानी आने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। वाल्मीकिनगर बैराज पर पानी की कमी के चलते यह दिक्कत आई है। सिंचाई विभाग भी अब जल्दी मानसून सक्रिय होने की आस लगाए हुए है।
भारत-नेपाल सीमा स्थित वाल्मीकिनगर बैराज से निकली मुख्य पश्चिमी गंडक नहर से कुशीनगर जिले में करीब 65 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल की सिंचाई होती है। जिले में फैली 1700 किमी लंबी यह नहर प्रणाली सिंचाई की सबसे बड़ी कृत्रिम स्रोत है। हर साल मई महीने के आखिरी सप्ताह में इन नहरों में पानी छोड़ा जाता है। इससे किसानों को धान का बेहन गिराने और गन्ने के खेतों की सिंचाई में सहूलियत मिलती है।
इस वर्ष फरवरी महीने में मुख्य नहर में पानी बंद कर बैराज के पास मरम्मत का कार्य शुरू कराया गया था। सिंचाई विभाग को उम्मीद थी कि काम जल्दी हो जाने पर तय समय से पानी छोड़ा जा सकेगा। पिछले तीन सीजन से प्राकृतिक आपदा के चलते बर्बाद हो रही खेती से परेशान किसानों ने इस बार अच्छे मानसून की उम्मीद में मई के दूसरे पखवारे में तेजी से धान का बेहन गिराना शुरू किया।
सबको उम्मीद थी कि दो-चार दिन में ही नहरों में पानी आ जाएगा। परंतु जून के पहले सप्ताह में भी मुख्य पश्चिमी गंडक नहर में पानी नहीं आया। हालांकि हर सप्ताह हो रही बरसात से गन्ने की सिंचाई के लिए किसानों को बहुत ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ा है, लेकिन किसानों की असल चिंता यह है कि अगर सप्ताह भर में पानी नहीं आया तो धान की रोपाई के लिए भी पंपिगसेंट का ही सहारा लेना पड़ेगा।
इससे अतिरिक्त बोझ तो पड़ेगा ही, फसल को भरपूर पानी भी नहीं मिल पाएगा। नहरों में पानी छूटने में हो रही देरी से सिंचाई विभाग भी चिंतित है लेकिन इंतजार करने के सिवाय उनके पास भी कोई दूसरा रास्ता नहीं है।