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‘तराई की गंगा’ को है भगीरथ की तलाश

Sat, 04 Jun 2016 11:39 PM IST
कुशीनगर
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हिमालय की गोद से निकली गंडक (नारायणी) नदी कुशीनगर के लिए वरदान है। - फोटो : अमर उजाला
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पडरौना। हिमालय की गोद से निकली गंडक (नारायणी) नदी कुशीनगर के लिए वरदान है। करीब 80 हजार हेक्टेयर खेतों की सिंचाई इस नदी के जल पर निर्भर है। जिले के भूगर्भ जलस्तर को भी बनाए रखने में नदी का अहम योगदान है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस सदानीरा नदी में पानी कम होता जा रहा है।
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गंडक नदी नेपाल के वाल्मीकिनगर (त्रिवेणी) से आगे बढ़ने के बाद कुशीनगर में यूपी और बिहार के बीच सीमा रेखा का कार्य करती है। खड्डा, पडरौना और तमकुहीराज तहसील के बॉर्डर को छूते हुए निकल रही नदी का करीब 80 किलोमीटर हिस्सा कुशीनगर जिले की सीमा में  पड़ता है।


सत्तर के दशक में भारत और नेपाल सरकार के बीच हुए समझौते के तहत वाल्मीकिनगर में बैराज बनाकर गंडक नहर निकाली गई। कुशीनगर में 1700 किलोमीटर लंबाई में फैले नहरों के इस जाल से न केवल सिंचाई की सुविधा मिली, बल्कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में भी वृद्धि हो गई।
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भरपूर सिंचाई सुविधा मिलने का असर जिले के भूगर्भ जलस्तर पर भी पड़ा। परंतु पिछले कुछ वर्षों से नदी के जलस्तर में लगातार  कमी हो रही है। बरसात के चार महीने ऊफनाई रहने वाली यह नदी पिछले वर्ष केवल एक बार ही दो लाख क्यूसेक के जलस्तर को छू पाई थी। अप्रैल-मई की प्रचंड गर्मी में नदी में पानी का प्रवाह 20  हजार क्यूसेक के आसपास ही रह गया है।

नदी के किनारे लगते हैं मेले
गंडक नदी के किनारे वाल्मीकिनगर बैराज से लगायत बिहार के सोनपुर तक जगह-जगह मेला लगता है। कुशीनगर जिले में भैंसहा घाट पर चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर और पनियहवां घाट पर कार्तिक पूर्णिमा व माघ की अमावस्या को भव्य मेला लगता है। इस मेले में कुशीनगर के अलावा बिहार के भी हजारों लोग आते हैं। इस मेले में लोगों का मेल मिलाप और स्‍थानीय लोगों के लिए रोजगार भी उपलब्‍ध हो जाता है। नदी तट शहरी लोगों के लिए बेहतरीन पिकनिक स्पॉट भी है।
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