पडरौना। सेवरही क्षेत्र के पिपराघाट गांव के देवनारायण टोला में बीते सोमवार शाम की हैवानियत भरी घटना हुई। बेटियों के प्रेम प्रसंग से नाराज पिता ने नाबालिग बेटों की मदद से दोनों बेटियों को लाठी-डंडे से पीटकर मौत के घाट उतार दिया। यह मनोवैज्ञानिक और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा आघात है।
समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिकता की चकाचौंध में संस्कार और मूल्यविहीन परंपराएं चल पड़ी हैं। इसकी रोकथाम के लिए समाज में फिर से मूल्य आधारित शिक्षा व संस्कार को महत्व देना होगा, तभी ऐसे कृत्यों पर लगाम व रोक लगाई जा सकती है। अन्यथा समाज में ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। सेवरही क्षेत्र के पिपराघाट गांव के देवनारायण टोला में पिता रामप्रसाद मल्लाह ने अपने दो नाबालिग बेटों की के साथ बेटियों लाली (20) और शीला (18) का गांव के ही दो युवकों के साथ प्रेम प्रसंग के चलते मौत की नींद सुला दी। पूरी घटना मूल्य विहीन संस्कार की कमी के चलते घटित होने की तरफ इशारा कर रही है।
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वर्तमान सामाजिक परिवेश में संस्कार विहीन व्यवस्था निर्मित हो रही है। शिक्षा व्यवस्था भी इस दिशा में बूस्टर का काम कर रही है। मौजूदा शैक्षणिक प्रणाली में मूल्य और संस्कार का कोई स्थान नहीं रह गया है। जब वर्तमान पीढ़ी इस परिवेश में परिपक्व हो रही तो उसकी परिणति संस्कार विहीन कृत्यों के रूप में सामने आ रही है। जिसको उसके अभिभावक बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं और उत्तेजना में आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। दूसरे शब्दों इसे ऑनर किलिंग भी कहा जा रहा है। इसलिए वर्तमान सरकार, समाज व परिवार सामूहिक जिम्मेदार है कि मूल्य परक शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए गंभीरता से विचार करें अन्यथा इस तरह के कृत्य पर अंकुश लगाना संभव नहीं हो सकेगा। -प्रो.अवधेश कुमार पांडेय, समाजशास्त्री, बुद्ध पीजी कॉलेज,कुशीनगर
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एक पिता अपने दो बेटों के साथ मिलकर दो बेटियों की पीट-पीटकर हत्या की घटना को अंजाम दे, यह घटना सिर्फ अपराध नहीं,बल्कि सामाजिक व मानसिक विकृति का चरम रूप है। एक पिता और उसके बेट मिलकर अपनी ही बेटियों व बहनों की हत्या कर देते हैं,तो यहां पर मनोविज्ञान का सामूहिक सोच का सिद्धांत काम करता है। जहां अपनों के मारने का अपराध बोध आपस में बंट जाता है। ऐसे मामलों में झूठी प्रतिष्ठा का अहंकार इस कदर हावी हो जाता है कि इंसान के अंदर से दया व स्वाभाविक प्रेम पूरी तरह खत्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में रक्षक ही सबसे क्रूर भक्षक बन जाते हैं। -प्रो. सीमा त्रिपाठी, मनोवैज्ञानिक,बुद्ध पीजी कॉलेज,कुशीनगर