खास मेहमान अपने देश में बताएंगे कुशीनगर की खासियत
- मिलेगा पर्यटन को बढ़ावा, कुशीनगर के दर्शनीय स्थलों की विदेशों में बढ़ेगी ख्याति
- वर्मा के राजदूत के भ्रमण के बाद तैयार कराया गया है उनका संदेश
- कुशीनगर आने वाले अन्य खास मेहमानों का संदेश भी उनकी भाषा में होगा तैयार
राकेश कुमार गौंड़
पडरौना (कुशीनगर)। भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने की वजह से कुशीनगर की ख्याति तो पहले से ही विदेशों में है, लेकिन यहां के प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों की ख्याति बढ़ाने की तरफ भी प्रयास शुरू हो गया है। श्रीलंका, जापान, थाईलैंड, चीन, वर्मा सहित अन्य देशों से कुशीनगर आने वाले खास मेहमानों (राजपरिवार के सदस्य अथवा राजदूत, अफसर, मंत्री, उद्योगपति आदि ) की भाषा में संदेश तैयार किया जाएगा। इसमें कुशीनगर के इन प्रमुख स्थलों का भ्रमण करने के बाद इनके संदेश का वीडियो होगा। इसे ये विशिष्ट मेहमान अपने देश में जाने पर वहां की सोशल मीडिया पर प्रसारित कराएंगे। इसकी शुरुआत कुशीनगर के तीन दिवसीय भ्रमण पर आए वर्मा के राजदूत से की गई है।
कुशीनगर कई विशेषताओं को समेटे है। यहां थाई-बौद्ध स्थापत्य शैली में बना विस्तृत प्रांगण का वाटथाई मंदिर, ईंट व रोड़ी से बनाया गया विशाल रामाभार स्तूप, जिसमें माना जाता है कि भगवान बुद्ध की अस्थियां रखी हुई हैं और महापरिनिर्वाण मंदिर यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। इसके अलावा माथाकुंवर, चीनी मंदिर, जापानी मंदिर और बौद्ध संग्रहालय भी हैं। यहां की विशेषताओं के प्रचार प्रसार के लिए समय-समय पर छाया चित्र प्रदर्शनी और डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी दिखाई जाती है।
कुशीनगर की विशेषताओं को विदेशों में पहुंचाने के लिए डीएम ने एक नया प्रयास शुरू किया है। विदेशों से आने वाले विशिष्ट व्यक्तियों का उनकी भाषा में एक वीडियोयुक्त संदेश तैयार किया जाएगा, जिसमें वह कुशीनगर की धार्मिक और ऐतिहासिक विशेषताएं बताएंगे। वह वीडियो उन्हें भेंट किया जाएगा, जिसे वे अपने देश लौटकर वहां की सोशल मीडिया में प्रसारित कराएंगे। इसकी शुरुआत नौ नवंबर की शाम से 11 नवंबर की सुबह तक कुशीनगर में रहे वर्मा के राजदूत ओम मोचो आंग से हुई है।
इतिहास के पन्ने में कुशीनगर का महत्व-
वैसे तो पयर्टन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश में कई जिले प्रमुख हैं, लेकिन अपने अत्यंत प्राचीन इतिहास के साथ कुशीनगर का अलग ही महत्व है। हिमालय की तराई वाले क्षेत्र में स्थित कुशीनगर का इतिहास प्राचीन व गौरवशाली है। वर्ष 1876 ई. में अंग्रेज पुरातत्वविद ए. कनिंघम ने कुशीनगर की खोज की थी। उस समय खुदाई में छठी शताब्दी की बनी भगवान बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा मिली थी। इसके अलावा रामाभार स्तूप और माथाकुंवर मंदिर भी खोजे गए थे। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है कि यह स्थान त्रेता युग में भी आबाद था और यहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के पुत्र कुश की राजधानी थी, जिसके चलते इसे कुशावती के नाम से जाना गया। फिर कुशीनारा और उसके बाद कुशीनगर पड़ा। छठी शताब्दी की शुरुआत में यहां भगवान बुद्ध का आगमन हुआ था। कुशीनगर में ही उन्होंने अपना अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया था। यहां कई अन्य भी दर्शनीय स्थल हैं।
कुशीनगर में अनेक धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल हैं। हर साल देशी-विदेशी पर्यटक आते भी हैं। यहां की विशेषताओं को विदेशों में और अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए नया प्रयास शुरू किया गया है। विदेशों से जो भी विशिष्ट नागरिक आएंगे, उन्हें भ्रमण के बाद उनकी भाषा में एक वीडियो संदेश तैयार कराकर भेंट किया जाएगा, जिसे वे अपने देश में जाकर वहां की सोशल मीडिया पर प्रसारित कराएंगे। इससे यहां पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। क्योंकि यहां के एयरपोर्ट से उड़ान शुरू हो जाने के बाद पर्यटकों का आना और भी सुगम हो जाएगा।
भूपेंद्र एस चौधरी,
जिलाधिकारी