पडरौना (कुशीनगर)। एड्स या एचआईवी ऐसे लफ्ज हैं, जिनके बारे में सुनकर किसी के भी जेहन में सिहरन दौड़ जाती है, लेकिन कुशीनगर जनपद में छह बच्चों ने इस जानलेवा बीमारी को भी मात दे दी है। यहां एचआईवी पीड़ित छह माता-पिता के घरों में भी न केवल बच्चों की किलकारियां गूंजीं, बल्कि जांच में भी वे एचआईवी निगेटिव पाए गए। पिछले वर्ष में जन्मे ऐसे बच्चों की तादाद 21 थी। यह सभी बच्चे अब भी स्वस्थ हैं।
कुशीनगर के जिला अस्पताल के आईसीटीसी (एकीकृत परिवार परामर्श केंद्र) में एचआईवी पीड़ित पुरुषों और महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच वर्ष 2004 से ही शुरू हो गई थी। तब से यहां की स्वास्थ्य सुविधाओं में निरंतर सुधार आ रहा है। नतीजा यह है कि बहुत से लोग अब स्वेच्छा से भी अपना एचआईवी जांच कराते हैं, जहां इनका पूरा ब्योरा गोपनीय रखा जाता है।
चूंकि बाहर से कमाकर घर लौटने वाले एचआईवी पीड़ित व्यक्तियों से उनकी पत्नी को भी खतरा रहता है, इसलिए एचआईवी और एड्स पीड़ित मरीजों की मुफ्त जांच, उचित परामर्श, दवा और सही देख-रेख के लिए जिला अस्पताल में एआरटी सेंटर और पीपीटीसीटी (प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट टू चाइल्ड ट्रांसमिशन) की स्थापना कर दी गई। तब से ऐसे मरीजों की स्वास्थ्य सुविधाओं में निरंतर सुधार हो रहा है, जिसका नतीजा है कि कुछ हद तक यह बीमारी नियंत्रण में भी होने लगी है। नियमित दवा लेने वाले मरीज पहले से बेहतर महसूस कर रहे हैं।
पीपीटीसीटी का सबसे सुखद प्रभाव यह है कि पिछले दो वर्षों से यहां नोडल अफसर, महिला डॉक्टर, काउंसलर व एलटी की देखरेख में हुए इलाज के बाद एचआईवी पीड़ित माता-पिता के बच्चे न केवल बिल्कुल स्वस्थ जन्मे, बल्कि जांच में एचआईवी निगेटिव भी पाए गए।
वरिष्ठ परामर्शदाता, फिजिशियन एवं नोडल अधिकारी डॉ. राजेश कुमार का कहना है कि एड्स के मरीज नियमित दवा के सेवन से अपनी पूरी जिंदगी जी सकते हैं। जिला अस्पताल में इसके संपूर्ण जांच की सुविधा है। यहां एचआईवी पीड़ित गर्भवती महिलाओं ने भी विभागीय देखरेख में स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया है। पिछले सत्र में 21 और इस बार छह स्वस्थ बच्चे जन्मे हैं।