कुशीनगर। जिले मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी मरीजों के इलाज में अब अनुमान नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक के आधार पर दवाओं का चयन किया जा रहा है। यदि किसी मरीज पर टीबी की दवा असर नहीं कर रही है या बैक्टीरिया उस दवा के प्रति प्रतिरोधी (रेजिस्टेंट) हो गया है, तो इसकी जानकारी अब नॉट मशीन के जरिए जल्द मिल सकेगी। इससे डॉक्टर समय रहते दवा बदल सकेंगे और मरीज को लंबे समय तक बेअसर दवाएं लेने से राहत मिलेगी।
जिले में कभी जेई/एईएस का इतना प्रकोप रहा कि कितनी मां की गोद सूनी हो गईं। सरकार के तमाम प्रयास के बाद इससे छुटकारा मिला, लेकिन टीबी के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। करीब पांच साल से टीबी की चपेट में आए रोगियों को इलाज के दौरान तय कोर्स से अधिक दवा लेना पड़ती थी। पहले डाक्टर दवा का कोर्स पूरा कराने के बाद जांच कराते थे, तो कई मरीजों में दवा के कोर्स के हिसाब से मरीजों की रिकवरी काफी कम रहती थी और वह मरीज एमडीआर यानी गंभीर श्रेणी में पहुंच जाता था। इसके लिए दोबारा कोर्स पूरा कराना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
जिले में तीन माह के अंदर 135 टीबी के एमडीआर मरीजों को कौन सी दवा असरदार है या नहीं यह समय रहते जांच में नॉट मशीन बता दिया और डाक्टरों ने दवा बदलकर एमडीआर टीबी मरीजों को तय समय में रिकवरी कर लिया। पहले मरीजों के नमूनों की कल्चर और ड्रग सेंसिटिविटी जांच में कई सप्ताह लग जाते थे। रिपोर्ट आने तक मरीज उसी दवा पर चलता रहता था, जो कई बार प्रभावी नहीं होती थी। नई नॉट मशीन इस प्रक्रिया को तेज कर रही है। मशीन यह पता लगाने में मदद करती है कि कौन-सी दवा मरीज पर असर करेगी और किन दवाओं के प्रति बैक्टीरिया ने प्रतिरोध विकसित कर लिया है।
एसीएमओ व जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एसएन त्रिपाठी का कहना है कि एमडीआर टीबी मरीजों के उपचार में सही दवा का चयन सबसे बड़ी चुनौती होती है। पहले मरीजों में दवा के प्रति प्रतिरोध का पता चलने में काफी समय लग जाता था।इससे बीमारी बढ़ने और संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता था। टीबी के मरीजों का उपचार चरणबद्ध तरीके से किया जाता है। पहले चरण में करीब छह माह तक पांच प्रकार की दवाएं दी जाती हैं। यदि मरीज के शरीर में किसी दवा के प्रति प्रतिरोधक विकसित हो जाता है तो उपचार की रणनीति बदलनी पड़ती है। नॉट मशीन इसी प्रतिरोध की पहचान कर डॉक्टरों को समय रहते सतर्क कर देती है और कम समय में सटीक रिपोर्ट मिल जा रही है। इसलिए इलाज और आसान हो गया है। नई तकनीक के उपयोग से एमडीआर टीबी मरीजों के उपचार की सफलता दर में सुधार हो रहा है। साथ ही मरीजों को अनावश्यक दवाएं लेने से भी राहत मिल रही है, जिससे इलाज अधिक प्रभावी और सुरक्षित बन रहा है
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-जिलेे में 19 टीबी यूनिट
-21 नॉट मशीन यूनिटों पर लगी है
-पहले नौ नाॅट मशीन थी,12 नया मिली है।
-तीन पोर्टेबल एक्सरे मशीन जिले में है।
-जिले में 409 गांव हाई रिस्क श्रेणी
-छह से नौ माह तक है टीबी रोगियों के ठीक होने का कोर्स
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-नॉट मशीन आ जाने से टीबी रोगियों के इलाज में काफी सहूलियत हुई है। मरीजों को दी जाने वाली दवा असरदार है या नहीं, यह मशीन जांच के दौरान बता दे रही है। उस दवा को बंद कर दूसरी दवा चलाई जा रही है। ऐसे टीबी के 135 गंभीर रोगियों को ठीक किया जा चुका है, जो गंभीर श्रेणी के टीबी मरीज रहे। -डॉ. चंद्रप्रकाश, सीएमओ कुशीनगर