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बिना भक्ति के नहीं मिलती मुक्ति

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लोककथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भक्ति का महत्व बताया
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संवाद न्यूज एजेंसी
कसया। महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर में चल रही नौ दिवसीय रामकथा के छठे दिन बृहस्पतिवार को कथा वाचक मोरारी बापू ने श्रद्धालुओं को अस्थि विसर्जन की कथा का रोचक प्रसंग सुनाया। प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
बापू ने कहा कि बिना भक्ति के किसी प्राणी को मुक्ति नहीं मिल सकती है। एक 80 वर्षीया बुढ़िया थी, जिसे प्रभु का नाम लेना स्वीकार नहीं था। उसके तीनों बेटों ने काफी प्रयास किया लेकिन बुढ़िया राम का नाम लेने को तैयार नहीं थी। बुढ़िया के छोटे और मझले बेटे मंदिर और मंदिर के गर्भगृह में राम दरबार का दर्शन कराने ले गए। वहां बेटों ने जब मां से पूछा कि यह क्या है तो उसने कहा कि हर गांव में ऐसा होता है। फिर मंदिर के अंदर गर्भगृह में राम दरबार को दिखाकर पूछा तो उसने कहा जहां ऐसा होता है तो वहां वैसा भी होता ही है। कुछ दिनों बाद बुढ़िया का निधन हो गया। अंतिम संस्कार के बाद बड़ा बेटा मां के अस्थियों को एक डिब्बी में रखकर हरिद्वार में विसर्जन के लिए लेकर गया। हरिद्वार से पहले बेटा दिल्ली में एक मित्र के घर रुक गया। अगले दिन हरिद्वार पहुंचा जहां अस्थि विसर्जन के लिए पूजा की। परंतु विसर्जन के लिए जब अस्थियों की तलाश की तो वह नहीं मिली।
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बुढ़िया का पुत्र वापस दिल्ली अपने मित्र के यहां पहुंचा और अस्थियों का डिब्बा गायब होने की बात कही। इसके बाद मित्र ने बताया कि उसकी पत्नी को ऐसा लगा कि मांसाहार के पश्चात तुमने हड्डियों को डिब्बे में रखा होगा, इससे नाराज होकर उसने डिब्बे को ही गटर में विसर्जित कर दिया। पुत्र वापस आया और एक साल बाद तीनों बेटे अपनी पत्नियों के साथ फिर कुछ अस्थियों को विसर्जन के लिए हरिद्वार लेकर गए। इस बार डिब्बा समेत अस्थियों को विसर्जित किया गया। इस बार बुढ़िया की छोटी बहु जो कुछ दूर आगे खड़ी थी, उसे वहीं डिब्बा मिला जिसे उसने मां गंगा का प्रसाद मानकर अपने पास रख लिया। दो बार प्रयास के बाद भी बुढ़िया की हड्डियों को गंगा नदी में विसर्जित नहीं हो सकी।
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