पडरौना। वर्ष 2011 में हुई जनगणना के दौरान कर्मियों की एक गलती से कुशीनगर जिले के 80 हजार अंजान लोग अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आ गए। इसी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में पद आरक्षित कर दिए गए। नतीजा यह हुआ कि अब भी जिले के 17 गांवों में प्रधान का चुनाव नहीं हो पाया। कई जगह ग्राम पंचायत सदस्य और बीडीसी सदस्य के पद भी रिक्त चल रहे हैं।
वर्ष 1994 में अस्तित्व में आए कुशीनगर जिले के सभी गांवों में पिछड़ी और अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं। परंतु अनुसूचित जनजाति की आबादी यहां बेहद कम है। वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार इस जिले में सिर्फ 91 लोग अनुसूचित जनजाति के थे, जिनमें से 56 पुरुष और 35 महिलाएं थीं। वर्ष 2001 में यह संख्या बढ़कर 419 हुई, जिसमें 199 पुरुष और 220 महिलाएं थीं। परंतु वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में इस जिले में अनुसूचित जातियों की संख्या बढ़कर 80269 हो गई। इसमें 41003 पुरुष और 39266 महिलाएं बताई जाती हैं। आश्चर्यजनक यह है कि जिले के अर्थ एवं संख्या विभाग तक को नहीं पता है कि अचानक बढ़ी यह आबादी आखिर आई कहां से। पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में अनुसूचित जनजाति की इस जनसंख्या को आधार मानकर 1121 ग्राम पंचायतों में से 40 ग्राम पंचायतों में प्रधान का पद आरक्षित कर दिया गया। परंतु जब चुनाव हुआ तो अधिकांश सीटें खाली रह गईं। वजह यही कि जो ग्राम पंचायतें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित की गईं, वहां इस जाति के लोग थे ही नहीं। कुछ लोगों ने पड़ोसी जिला देवरिया या अन्य जगहों से प्रमाण पत्र लगाकर चुनाव लड़ा। आम चुनाव के बाद प्रशासन ने इन रिक्त सीटों को भरने के लिए उपचुनाव कराया, लेकिन 17 गांवों में दावेदार नहीं मिले। इस वक्त फिर उपचुनाव की प्रक्रिया चल रही है। रामकोला, पडरौना और दुदही ब्लॉक के कुछ गांवों में नामांकन पत्र जमा हुआ, लेकिन इस पर लोगों ने आपत्ति कर दी। जांच के दौरान इन सभी गांवों के पर्चे खारिज हो गए। लिहाजा इस बार भी सीटें रिक्त रह जाएंगी।