-कार्रवाई के नाम पर पत्र-पत्र खेलता रहा विभाग... खुलेआम कार्यों का संपादन करता रहा अरविंद
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। जिले के स्वच्छ भारत मिशन के कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल उर्फ अरविंद प्रसाद की ओर से बड़े स्तर का फर्जीवाड़ा किया गया है। यह किसी से छिपा नहीं है। इसके बावजूद इसमें जांच के लिए जिला प्रशासन संजीदा नजर नहीं आ रहा है। दो माह से चर्चा में रहने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर पर कार्रवाई तो दूर की बात है। प्रशासन ने जांच के लिए अभी तक न कोई टीम गठित की है, और न ही कोई सार्थक प्रयास।
इससे न केवल स्वास्थ्य और विकास विभाग बल्कि जिला प्रशासन कठघरे में आ गया है। इसके चलते जिम्मेदारों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बहरहाल, प्रमाणपत्र फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड अरविंद प्रशासन के लिए अबूझ पहेली बनकर रह गया है। ग्राम पंचायत की सीआरएस (सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम) की आईडी से फर्जी तरीके से न केवल कुशीनगर बल्कि कई प्रांतों में जन्म प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। प्रथम दृष्टया जांच में यह बात सामने आई थी कि तमकुही ब्लॉक के तिरमासाहुन गांव के सचिव की आईडी से सैकड़ों फर्जी प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं।
सूत्रों की मानें तो इसके अलावा भी इसी ब्लॉक के कई गांव में फर्जीवाड़ा किया गया है, लेकिन जांच के नाम पर विकास विभाग काफी धीरे है।जांच तो दूर की बात है डीपीआरओ से लेकर एडीओ पंचायत और सचिव महज दो माह से अरविंद पर कार्रवाई और जांच के नाम पर पत्र-पत्र खेल रहे हैं। अमर उजाला ने खबर के माध्यम से दो सितंबर को जांच को आधार बनाकर खबर प्रकाशित की तो मालूम हुआ कि विभाग पुराने डाटा को निकालने में अक्षम है। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया, और डीपीआरओ ने एडीओ पंचायत को लिखे पत्र का हवाला देते हुए अफसरों को गुमराह किया था।
हाथरस के कई गांव में हुए जन्म प्रमाणपत्र फर्जीवाड़े में उसी अरविंद का नाम आ गया, जिस पर कुशीनगर में सचिव की आईडी से फर्जीवाड़े का आरोप लग रहा था। हाथरस की साइबर सेल ने अरविंद से पूछताछ के बाद कई सुराग पाए हैं। फिलहाल उससे पूछताछ के बाद प्रमाणपत्रों का सत्यापन किया जा रहा है। कंप्यूटर ऑपरेटर जब हाथरस पुलिस की गिरफ्त में आया, तो जिम्मेदार एक दूसरे को दोषी बताते हुए खुद को बचाते नजर आ रहे हैं। हालांकि डीएम ने डीपीआरओ को गड़बड़ियों की जांच कर लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई का आदेश दिया है।
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कार्रवाई दूर की बात... एफआईआर तक दर्ज नहीं करा सका विभाग
जुलाई में सीएमओ सुरेश पटारिया की ओर से जांच की सिफारिश करने के बाद अरविंद के काले कारनामों से पर्दा उठना शुरू तो हुआ था, लेकिन विकास विभाग की टीम पत्र में ही उलझी रह गई। 29 जुलाई को जिला पंचायत राज अधिकारी द्वारा पत्र जारी कर सभी सचिवों को सावधान रहते हुए अपने-अपने पासवर्ड बदलने का निर्देश देते हुए अरविंद प्रसाद को तमकुही ब्लॉक से सेवरही ब्लॉक से स्पष्टीकरण की मांग करते हुए डीपीआरओ द्वारा स्थानांतरित किया जाता है। दो दिन बाद पत्र के माध्यम से एडीओ पंचायत को अरविंद प्रसाद पर एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश डीपीआरओ द्वारा दिया जाता है। इसके बाद एडीओ पंचायत द्वारा 21 अगस्त को प्रभारी निरीक्षक तमकुहीराज को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाता है। अगले ही दिन 22 अगस्त को एडीओ पंचायत द्वारा डीपीआरओ को भेजे पत्र में अवगत कराया जाता है कि उक्त कंप्यूटर ऑपरेटर पर एफआईआर दर्ज करा दी गई है, लेकिन जब इसकी पड़ताल की गई तो मालूम हुआ कि विभाग एफआईआर तक दर्ज नहीं करा सका है।
एडीओ पंचायत तमकुही रामायन गुप्ता ने बताया कि एफआईआर दर्ज हुई कि नहीं, यह नहीं बता सकते। हमने एफआईआर दर्ज करने के लिए तत्कालीन थाना प्रभारी को पत्र दिया था। प्रभारी निरीक्षक तमकुहीराज अमित शर्मा ने बताया कि अभी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
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कौन सी चल रही थी गोपनीय जांच...अब खड़ा हो रहा सवाल
अमर उजाला ने आठ अगस्त के अंक में ''''जन्म प्रमाणपत्र में फर्जीवाड़े के शक'''' शीर्षक से खबर प्रकाशित की। इसके बाद जिला पंचायत राज अधिकारी आलोक प्रियदर्शी ने सभी एडीओ पंचायत और सचिवों को पुराने डाटा निकालकर मिलान करने का निर्देश दिया। इसके बाद समय-समय पर पूछने पर डीपीआरओ द्वारा बताया जाता था कि गोपनीय जांच की जा रही है। वर्तमान कार्रवाई से अवगत नहीं कराया जा सकता। हालांकि एक माह बाद जांच और कार्रवाई में बाधा आने की स्थिति स्पष्ट हुई और पता चला कि डाटा निकलने में हो रही परेशानी के कारण कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि इतने व्यापक पैमाने पर हुए फर्जीवाड़े से अवगत होते हुए भी जिला पंचायत राज अधिकारी ने अपने आला अधिकारियों से इसके जांच की सिफारिश क्यों नहीं की? रायबरेली जैसी विशेषज्ञ एजेंसी से मदद की सिफारिश क्यों नहीं की? कुछ ऐसे ही सवाल से डीपीआरओ की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यही नहीं डीपीआरओ के साथ ब्लॉक के वीडीओ, एडीओ पंचायत और सचिवों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। सवाल तो यह भी है कि हाथरस पुलिस द्वारा उठाए जाने के बाद भी जिला प्रशासन अरविंद प्रसाद के ऊपर जांच टीम का गठन क्यों नहीं कर रहा है। दबी जुबान में इस बात की चर्चा है कि इस फर्जीवाड़े में कुछ विभागीय कर्मी के होने के कारण भी प्रशासन अपनी नाकामी छिपाने में पीछे हट रहा है।