जिला अस्पताल से चार महीने में विभिन्न कारणों से निकले करीब 900 मरीज
निजी एंबुलेंस चालकों की भरमार, मौका पाते ही लपक लेते हैं मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। चार महीने में 900 मरीज जिला अस्पताल से बिना इलाज कराए निकल गए। इनके जाने की वजह कहीं मरीजों की अपनी विवशता तो कहीं बिचौलियों की सक्रियता रही, जो बाहर मिले परिजनों को बेहतर इलाज का सब्जबाग दिखाकर निजी अस्पतालों में लेकर चले गए।
जिला अस्पताल में चार माह के भीतर करीब 15 हजार मरीज भर्ती कराए गए। इनमें लगभग 90 मरीजों की मौत हुई, जबकि करीब 900 मरीज भर्ती होने के बावजूद इलाज कराए बिना ही चले गए।
जिला अस्पताल में मई महीने में 3682 मरीज भर्ती कराए गए। इनमें 28 की मौत हुई, जबकि 260 इलाज कराए बिना ही चले गए। जून में 4319 मरीज भर्ती हुए। इनमें 23 की मौत हुई तथा 253 इलाज बीच में ही छोड़कर दूसरे अस्पतालों में चले गए। जुलाई में भी मरीजों के दूसरे अस्पतालों में जाने का सिलसिला जारी रहा। इस महीने 3931 मरीज भर्ती कराए गए। इनमें 28 की मौत हुई तथा 186 मरीज बगैर इलाज कराए चले गए। कमोवेश यही स्थिति अगस्त महीने की भी रही। हालांकि, अगस्त महीने की रिपोर्ट कंपाइल न होने के कारण अभी तैयार नहीं हो सकी है। इन चार महीनों में करीब 900 मरीज इलाज कराए बिना ही दूसरे अस्पतालों में चले गए।
जिला अस्पताल आने वाले मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर शहर के कुछ गिने-चुने निजी अस्पतालों या गोरखपुर के निजी अस्पतालों में भेज दिया जाता है। इनमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं, कुछ निजी एंबुलेंस चालक। वे जिला अस्पताल के आसपास रहते हैं। गंभीर हालत में मरीज लेकर आने वालों पर अपना दांव आजमाते हैं। यदि मरीज के परिवारवाले उनके शीशे में उतर गए तो उन्हें मनमाफिक जगह भेज देते हैं। बदले में उन्हें निजी अस्पताल संचालक उन्हें अच्छा-खासा कमीशन दे देते हैं।
वैसे तो जिला अस्पताल के पर्ची काउंटर से लेकर ओपीडी, इमरजेंसी कक्ष, एक्सरे और अल्ट्रासाउंड सेंटर, पैथाेलॉजी और सिटी स्कैन कक्ष के आसपास बिचौलियों की भरमार रहती है। जिला अस्पताल प्रशासन की तरफ से कई बार इसकी शिकायत की गई। मजिस्ट्रेट का छापा तक पड़ा। काफी संख्या में बिचौलिए पकड़कर जेल भेजे गए। उसके बाद कुछ ने रास्ता बदल लिया। कोई बैंक से ऋण लेकर ई-रिक्शा खरीदकर चला रहा है तो किसी ने दुकान खोल ली।
इसके बावजूद काफी संख्या में बिचौलिए जिला अस्पताल में अब भी सक्रिय हैं। इनमें छह से अधिक महिलाएं भी हैं। उन पर तो किसी कार्रवाई का असर नहीं पड़ता है। मरीजों को झांसा देकर मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदवा देती हैं। कुछ ऐसी भी हैं, जो कमीशन के लालच में बिचौलियों के माध्यम से मरीजों को निजी अस्पतालों में भेज देती हैं। यहां तक कि भर्ती मरीज भी जिला अस्पताल से शहर के कुछ गिने-चुने निजी अस्पतालों या गोरखपुर भेज दिए जाते हैं। ऐसे लामा (लीव अगेंस्ट मेडिकल एडवाइज) मरीजों की जिला अस्पताल में लंबी फेहरिश्त है।
यह तो रही जिला अस्पताल के अंदर सक्रिय बिचौलियों की बात। इसके बाहर भी मरीज माफिया सक्रिय बताए जाते हैं। सस्ते इलाज की उम्मीद में जिला अस्पताल आने वाले मरीजों को जिला अस्पताल से बेहतर निजी अस्पताल में इलाज की सुविधा बताकर वहां भेज दिया जाता है। इसमें कुछ निजी एंबुलेंस चालक भी शामिल होना बताए जाते हैं।
जिला अस्पताल परिसर में तो इक्का-दुक्का एंबुलेंस ही खड़ी होती हैं, लेकिन उसके अगल-बगल 10 से अधिक निजी एंबुलेंस हैं, जो मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाती हैं। बदले में उनका कमीशन हाथोंहाथ मिल जाता है। सूत्र बताते हैं कि सामान्य तौर पर निजी एंबुलेंस सचालक पडरौना शहर के किसी अस्पताल में मरीज को ले जाने के लिए 500 रुपये, कसया के निजी अस्पताल ले जाने पर 1,000 हजार रुपये और गोरखपुर ले जाने के न्यूनतम 2,000 हजार रुपये लेते हैं। अगर निजी अस्पतालों से कमीशन की बात हो तो रकम 5,000 रुपये तक या उससे भी अधिक पहुंच जाती है। इन एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलिंडर को छोड़कर अन्य कोई सुविधा भी नहीं रहती है।
सरकारी स्वास्थ्यकर्मी भी कमीशन के चक्कर में करते हैं गलती
बीते नौ जुलाई को रामकोला थाना क्षेत्र के धुआंटीकर गांव के निवासी अर्जुन की 32 वर्षीय पत्नी मंसा कसया थाना क्षेत्र के मैनपुर स्थित मायके में थी। प्रसव पीड़ा होने पर गांव की आशा उसे सपहां सीएचसी पर न ले जाकर नौगावां के पास एएनएम के निजी आवास पर लेकर चली गई। घरवालों का आरोप था कि एएनएम के इंजेक्शन लगाने के बाद गर्भवती महिला को झटका आया और सांसें रुक गईं। आनन-फानन प्राइवेट एंबुलेंस से जिला अस्पताल भेज दिया। यहां गर्भवती को देखने के बाद महिला डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। नाराज घरवालों ने अस्पताल में हंगामा भी किया था।
सरकारी हों या निजी एंबुलेंस, मानकों पर नहीं बैठते
परिवहन विभाग की मानी जाए तो सरकारी हों या निजी एंबुलेंस, ज्यादातर बिना मानकों को पूरा किए संचालित की जा रही हैं। उसके बावजूद मनमाना किराया भी वसूल रहे हैं। एंबुलेंस की फिटनेस के लिए टाइप-1 कटेगरी में 33 और टाइप-2 कटेगरी में 11 मानक बनाए गए हैं। फिटनेस जांच में अधिकतर एंबुलेंस में कमियां पाई गई हैं। फिर भी इनका संचालन हो रहा है। इसकी वजह से पूर्व में कई बार ये रास्ते में बंद भी हो चुकी हैं।
फिटनेस के लिए इन मानकों की होती है जांच
परिवहन विभाग की मानी जाए तो टाइप-1 कटेगरी में स्टेशनरी ऑक्सीजन, पोर्टेबल ऑक्सीजन, सिलिंडर के लिए वाल्व, ऑक्सीजन इनलेट और मॉस्क वायुमार्ग के साथ, ऑक्सीजन इनलेट के साथ माथ टू मास्क वेंटिलेटर, पोर्टेबल सेक्शन एस्पिरेटर इलेक्टि्क व मैनुअल, घावों के उपचार के लिए इन्फ्यूजन माउंटिंग सामग्री, गुर्दे का कटोरा, उल्टी की थैली, शॉर्प कंटेनर, ग्लब्स, आपातकालीन डिलीवरी किट, क्लीनिकल अपशिष्ट बैग, गैर बुनी स्ट्रेचर शीट, उच्च दृश्यता परावर्तक जैकेट या टैबर्ड सहित बुनियादी सुरक्षात्मक कपड़े, सुरक्षा-मलबा दस्ताने एक जोड़ी, सेफ्टी जूते, वार्निंग लाइट सहित ऐसे अनेक मानक तय किए गए हैं, जो एंबुलेंस में नहीं होते।