इस आंदोलन का दमन करने के लिए अंग्रेजों ने कई गांवों में लोगों के घर फूंक दिए थे। इसके विरोध में 18 अगस्त 1942 को क्षेत्रीय लोगों ने कांग्रेस मंडल कार्यालय पर सभा आयोजित की। इसमें कई गांवों के लोग शामिल हुए थे। इसमें निर्णय किया गया कि अंग्रेजों की चीनी मिल, रेलवे स्टेशन और पोस्ट आफिस पर तिरंगा फहराएगा जाएगा।
इस संकल्प के साथ देशभक्तों की टोली ने तिरंगा फहराने के लिए कूच कर दिया। इसकी भनक अंग्रेज अफसरों को लग गई थी। उन्होंने मालगोदाम पर मोर्चा संभाल लिया था, लेकिन जब देशभक्तों का जत्था मालगोदाम की तरफ बढ़ने लगा तो हजारों की निहत्थे भीड़ पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इससे सेवरही की धरती भी रणबांकुरों के खून से लाल हो गई थी।
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इस गोली कांड में क्षेत्र के जतन, जानकी चौबे, रघुवीर, धरीक्षन राय, मथुरा सिंह, रामानंद, लुटावन सिंह, भोला, फेकू भगत, भुइलोट और मंगल सहित 11 रणबांकुरे शहीद हो गए। 1946 में अंग्रेजों ने जब बड़े नेताओं को जेल से रिहा किया तो पंडित जवाहरलाल नेहरू फरवरी 1946 में गोरखपुर आए। वह सेवरही की घटना के बारे में सुनकर सेवरही आए और शहीदों के सम्मान में शहीद स्मारक की आधारशिला रख कर उनकी शहादत को सलाम किए थे। इसके बाद उन्होंने लोकमान्य इंटर काॅलेज के विजिटर बुक पर हस्ताक्षर किए थे।
सेवरही का शहीद स्मारक 1946 से 1996 तक काफी उपेक्षित रहा। लेकिन वर्ष 1996 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल बोरा ने शहीद स्मारक के सुंदरीकरण के लिए 10 लाख रुपये का आवंटन किया था। इससे शहीद स्मारक का कायाकल्प किया गया और 2013 में डीएम के प्रयास से स्मारक परिसर का सुंदरीकरण कराया गया था।