तुर्कपट्टी।
तमकुही ब्लाक के छहूं गांव स्थित मंदिर परिसर के चहारदीवारी निर्माण के लिए हो रही खुदाई के दौरान मिल रही मूर्तियां गुप्त काल की हो सकती हैं। मंगलवार को गोरखपुर से आए इतिहासकारों के एक दल ने मूर्तियों की बनावट के आधार पर यह दावा किया। टीम ने मंदिर के अलावा गांव के उत्तर स्थित नौ अन्य टीलों को भी देखा। एक मूर्ति को तुर्कपट्टी के सूर्य मंदिर की प्रतिमा से भी अधिक महत्व का बताया गया।
मंगलवार की सुबह 10 बजे इतिहासकार डॉक्टर कृष्णानन्द त्रिपाठी, पीके लहरी, डॉक्टर महाबीर प्रसाद कंदोई सहित सात इतिहासकारों का दल छहूं गांव पहुंचा। इस दल ने गांव के उत्तर तरफ एक टीले पर स्थित मंदिर परिसर में खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों को देखा। बीते 2 मार्च को यहां से मिली पहली मूर्ति को टीम ने सैंड स्टोन की बनी सातवीं या आठवीं शताब्दी की अग्नि देवता की मूर्ति बताया।
एक ही पत्थर पर उकेरी गई नौ देवी देवताओं की मूर्तियों के विषय में इतिहासकारों का कहना था कि यह नौ ग्रहों सूर्य, चंद्रमा, राहु, केतु आदि की मूर्तियां हैं, जिसकी पूजा हर्षकाल में सकलडीह ब्राम्हण किया करते थे। तीसरी मूर्ति ब्रह्मा की है, जिनके साथ कार्तिकेय हैं। वर्तमान में राजस्थान के पुष्कर में ब्रह्मा की पूजा होती है। इस मूर्ति का मिलना यह साबित करता है कि जैन और बौद्ध धर्म के पूर्व और बाद में भी यहां हिन्दू संस्कृति काफी समृद्ध थी। सकलडीहा ब्राह्मण सूर्य, ब्रह्मा और अग्नि देवता के उपासक थे। सभी मूर्तियों का कालखंड एक ही है और सब सेंड स्टोन की बनी मालूम पड़ती है । इतिहासकारों ने इस गांव में वर्ष 1976 से 1980 के बीच मिली मूर्तियों, बर्तन व शिलालेख आदि का भी निरीक्षण किया। एक प्रतिमा को उन्होंने सूर्य प्रतिमा करार दिया और उसे तुर्कपट्टी में मिली सूर्य प्रतिमा से भी ज्यादा पौराणिक माना। इनका कहना था कि गांव के नौ टीलों के मध्य स्थित करीब तीन एकड़ का विशाल तालाब तुर्कपट्टी के सूर्यमंदिर से जुड़ा हो सकता है। संभव है यह सूर्य कुंड हो। बाराह और बाराही देवी की मूर्ति को देखकर इतिहासकारों ने बौद्ध काल में इस क्षेत्र को धार्मिक रूप से काफी समृद्ध होना बताया ।
इतिहासकारों के दल ने यह भी बताया कि वर्ष 1980 में सठियांव में खुदाई के दौरान मिला विशाल हवन कुंड का इस मूर्ति से गहरा रिश्ता हो सकता है। इस प्रकार की मूर्ति देश में कहीं और नहीं मिली है। इनका मानना था कि यहां से सिर्फ नौ किलोमीटर दूर श्रेष्ठी ग्राम सठियांव से भी इस गांव और टीलों का सम्बंध हो सकता है ।
इन इतिहासकारों का कहना था कि कुशीनगर, पावानगर और छहूं के आसपास मिल रही मूर्तियों का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत हो रहा है। इन स्थलों को संरक्षित किए जाने की जरूरत है। इन टीलों में कई राज दफन हो सकते हैं।