फाजिलनगर(कुशीनगर)। लोकसंस्कृति सभ्य समाज के निर्माण की नींव है। इसलिए लोगों को अपनी लोक परंपराओं को सहेजने का कार्य करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी की जीवन शैली को बेहतर बनाया जा सके।
ये बातें बीएचयू के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नीरज खरे ने कहीं। वे सोमवार को जोगिया जनुबीपट्टी में आयोजित 17वें लोकरंग कार्यक्रम के दूसरे दिन आयोजित लोकरंग के समावेशी तत्व विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सम्मोहित करना, सम्मोहन, हर्ष एवं आश्चर्य से अभिभूत कर देना ही लोकसंस्कृति के मूल समावेशी तत्व हैं। रीवा विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर दिनेश कुशवाहा ने कहा कि समाज से पाखंड, ढोंग अंधविश्वास को समाप्त करने वाले जनसंस्कृति की आवश्यकता है। अन्याय और कुप्रथा का विरोध करना सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
प्रोफेसर राहुल कुमार ने कहा कि हमारी संस्कृति में ही सब कुछ समाहित है, जैसे लोगों के रहन सहन, पहनावा, एक-दूसरे को समझने का प्रयास आदि जन संस्कृति का हिस्सा हैं। प्रोफेसर आशा सिंह ने कहा कि लोकरंग एक धर्म निरपेक्ष मंच है, जहां सभी लोग अपनी बातें रखने के लिए स्वतंत्र हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता जीतेंद्र भारती और संचालन प्रोफेसर रामजी ने किया। अंत में आयोजक व लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाषचंद्र कुशवाहा ने सभी अतिथियों के प्रति आभार जताते हुए कहा कि लोक संस्कृति में धार्मिक विभाजन, संस्कृति के विभाजन, समाज विभाजन, नफरत, झूठ और बिखराव को रोकने का कार्य करता है। संगोष्ठी को हारून सिद्दीकी, प्रमोद बागड़े, अपर्णा, डाॅ. दीनानाथ कुशवाहा, मनोज सिंह आदि ने संबोधित किया।
इस दौरान विष्णुदेव राय, जमसेश आलम, इजरायल अंसारी, सिकंदर, नितांत सिंह, रामकृष्ण कुशवाहा, बुलेट, अनुभव राय, भुनेश्वर राय, आशा कुशवाहा, मंजूर अंसारी, संजय कुशवाहा आदि मौजूद रहे।