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Kushinagar News: पहले डुबोते हैं, फिर उबारने का लेते हैं चढ़ावा

Fri, 28 Apr 2023 12:48 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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age No : 0तहसील सदर पडरौना,कुशीनगर।संवाद
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रजिस्ट्री के समय नाम-पते में कर देते हैं गलती, सुधारने के लिए लेते हैं रुपये
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खतौनी में नाम चढ़ाने में जानबूझकर की जाती है गड़बड़ी, फिर दौड़भाग करते हैं लोग
आवेदन के बाद लेखपाल तक की लगती है रिपोर्ट, कार्रवाई में गुजर जाते हैं महीनों
संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। जमीन के बैनामे के बाद खारिज-दाखिल में बड़े सलीके से खेल किया जाता है। अधिकतर लोगों के दस्तावेजों में गलत नाम-पता दर्ज कर दिया जाता है। जब खतौनी लेते हैं, तब इसकी जानकारी होती है। इसके बाद नाम-पता सही कराने में इतनी ज्यादा भाग-दौड़ करनी पड़ती है कि लोग परेशान हो जाते हैं। जब तक चढ़ावा नहीं देते, खामियां ठीक नहीं होतीं। नियम भी इतने जटिल हैं कि लोग इनमें उलझकर रह जाते हैं। इस प्रक्रिया में लोगों के ढाई से तीन हजार रुपये खर्च हो जाते हैं।
सिर्फ सदर तहसील में एक हजार से अधिक मामले लंबित बताए जाते हैं। छह से आठ महीने बीतने के बाद भी इनकी खामियां ठीक नहीं हो पा रही हैं। किसी-किसी मामले में वर्षों बीत चुके हैं।
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तहसील के सूत्र बताते हैं कि भूमि की रजिस्ट्री (बैनामा) कराने के दौरान दोनों पक्ष क्रेता और विक्रेता अपने सभी दस्तावेज जमा कराते हैं। इनके आधार पर 45 दिन में विक्रेता की जगह क्रेता का नाम दस्तावेज पर चढ़ाकर भूमि की खतौनी जारी करनी होती है।
सूत्र बताते हैं कि खतौनी बनाने के दौरान भी कई बार यह खेल होता है। कंप्यूटर में डाटा फीड करने के दौरान लिपिकीय त्रुटि लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है। इसके निपटारे में लोगों की जेब से ढाई हजार से अधिक रुपये खर्च हो जाते हैं। जितना पुराना मामला होता है, उसी के अनुरूप सुविधा शुल्क की मांग की जाती है।
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ये होती है प्रक्रिया
किसी बैनामे के खारिज-दाखिल के बाद नाम में होने वाली लिपिकीय त्रुटि सहित अन्य गड़बड़ी को दूर करने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके लिए त्रुटि संशोधन (करेक्शन ऑफ पेपर) आवेदन करना पड़ता है। इसे तहसीलदार के दफ्तर में जमा कराया जाता है। फिर इस पर रिपोर्ट लगाकर कानूनगो और लेखपाल के पास जाता है। लेखपाल की रिपोर्ट लगाकर प्रक्रिया के तहत दोबारा जब फाइल लौटती है, तब इस पर तहसीलदार आदेश करते हैं। तहसील से जुड़े लोगों की मानी जाए तो कई बार लेखपाल के स्तर से रिपोर्ट नहीं लगाई जाती है। संशोधन के लिए 45 दिन की समय सीमा तय है। इसके बावजूद इस कार्य में महीनों गुजर जाते हैं।
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सवालों से घेरे में लिपिकीय त्रुटि
किसी भी भूमि की रजिस्ट्री के दौरान कई प्रक्रिया अपनाई जाती है। क्रय और विक्रय करने वाले दोनों पक्ष अपने मूल दस्तावेजों के साथ निबंधक से संपर्क करते हैं। किसी अधिकृत अधिवक्ता से भूमि से संबंधित कागजात बनवाते हैं। दस्तावेज के रूप में दोनों पक्षों के पहचान पत्र, फोटो पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, पासपोर्ट साइज फोटो इत्यादि देते हैं। बैनामा के बाद खारिज दाखिल का आदेश डेढ़ माह बाद होता है। इस आदेश के बाद खतौनी के लिए कंप्यूटर में डाटा फीड किया जाता है। सभी आवश्यक प्रमाण पत्र और सही आदेश के बावजूद नाम गलत होने को लेकर बार-बार होने वाली लिपिकीय त्रुटि पर सवाल उठते हैं।
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इस तरह की सामने आती हैं गड़बड़ियां
नाम का डाटा फीड करते समय कंप्यूटर पर अक्षरों में गलती की जाती है। जैसे किसी का नाम विमल है तो उसकी जगह विमला लिख दिया जाता है। इसकी खतौनी निकालने पर नाम गलत या सही होने की जानकारी होती है। उसके बाद से जमीन का क्रेता नाम सुधरवाने में के लिए भागदौड़ करने लग जाता है।
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ये त्रुटियां भी की जाती हैं
- पति के नाम की जगह दर्ज कर देते हैं पिता का नाम।
- क्रेता की जगह विक्रेता और विक्रेता की जगह क्रेता का नाम चढ़ा देते हैं।
- जमीन की गाटा संख्या, चौहद्दी सहित अन्य कई तरह की त्रुटियां कर दी जाती हैं।
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एक वर्ष से है ऑनलाइन प्रक्रिया, फिर भी दौड़ाए जाते हैं लोग
निबंधन विभाग के एक अधिकारी ने अपना नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि पूर्व में रजिस्ट्री होने के बाद उप निबंधक कार्यालय से तहसीलों को एक प्रति कृषि बैनामे की खारिज-दाखिल के लिए भेजी जाती थी, लेकिन विगत एक वर्ष से ऑनलाइन प्रक्रिया कर दी गई है। इसमें रजिस्ट्री के बाद दूसरे दिन ही तहसीलों को ऑनलाइन रजिस्ट्री की प्रति भेज दी जाती है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत तहसीलों को ऑनलाइन प्रति प्राप्त होने के 35 दिनों के अंदर यदि कोई आपत्ति प्राप्त नहीं होती है तो खारिज दाखिल की प्रक्रिया स्वत: कर दी जाती है। फिर भी खारिज दाखिल के लिए तहसीलों में पक्षकारों के मूल अभिलेख व अन्य कागजात मांगे जाते हैंं और 35 दिन के बजाय महीनों और कुछ मामलों में वर्षों तक खारिज दाखिल नही किया जाता, जिससे जमीन खरीदने वाले लोग परेशान रहते हैं।
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केस-एक
सदर तहसील क्षेत्र के पिपरा सोमल गांव निवासी रामचंद्र बताते हैं कि बैनामे के बाद लिपिकीय त्रुटि के कारण जमीन लेने वाले लोगों को सुधार के लिए काफी दौड़भाग करनी पड़ती है। परिवार में भतीजे ने जमीन ली, लेकिन कुछ गड़बड़ियों की वजह से तहसील आना पड़ रहा है।
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केस-दो
सदर तहसील में मिले पडरौना के अमावस चौरसिया ने बताया कि जमीन खरीद ली, लेकिन खारिज-दाखिल सहित अन्य कार्यों के लिए फाइल करीब पांच वर्षों से एसडीएम न्यायालय से तहसील तक दौड़ रही है। उसके पीछे-पीछे खुद दौड़ रहे हैं।
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केस-तीन कुबेरस्थान के रामाज्ञा ने बताया कि सात साल पहले तहसील के एक मुंशी के माध्यम से पत्नी के नाम जमीन का बैनामा लिया था, लेकिन नाम में गलती हो जाने के कारण काफी परेशान होना पड़ा। मुंशी की फरमाइश पूरी करते रहे, लेकिन वह दौड़ाते रहे। अंत में नाम ठीक कराने के लिए उनके मांगने के मुताबिक पूरी रकम दी, तब जाकर सुधार हो पाया।
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केस-चार सिंहनजोड़ी के मदन बताते हैं कि तहसील में वकीलों और मुंशियों की मनमानी के चलते उनका काम भी नहीं हो रहा। तहसील से लेकर एसडीएम न्यायालय और लेखपाल से गुहार लगाते हुए थक चुका हूं। कई लेखपालों का तबादला हो गया, लेकिन समस्या जस की तस है।
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कोट
इस तरह की कोई गड़बड़ी न होने पाए, इस बारे में ध्यान रखने के निर्देश दिए गए हैं। यदि ऐसे मामले सामने आते हैं तो उनका निस्तारण कराया जाएगा।
सुमित सिंह, तहसीलदार सदर
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