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Kushinagar News: इस बरसात में भी डूबेंगे उत्खनित पुरावशेष, सुरक्षा के इंतजाम नहीं

Wed, 05 Jul 2023 12:29 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर, मांथा कुंवर मंदिर और रामाभार स्तूप हैं प्रमुख पूजनीय व दर्शनीय स्थल
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खुदाई से परिसर में निकले हैं बौद्ध कालीन धरोहर व अवशेष


संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। कुशीनगर में खुदाई में निकले भगवान बुद्ध से जुड़े पुरावशेषों के संरक्षण का अब तक कोई इंतजाम नहीं हो सका है। बरसात शुरू होते ही यहां के उत्खनित अवशेषों वाले स्थलों में पानी भरने लगा है। देश-विदेश के सैलानी भगवान बुद्ध से जुड़े जिन पुरातात्विक अवशेषों को देखने आएंगे, उन्हें वहां इस साल भी बारिश का पानी ही मिलेगा। इन स्थलों में प्रमुख रूप से मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर स्थल, मांथा कुंवर मंदिर और रामाभार स्तूप स्थल हैं।
बौद्ध अनुयायियों के लिए तीनों स्थल दर्शनीय और पूजनीय हैं। कुशीनगर के इसी पुरातात्विक महत्व को देखते हुए यहां इंटरनेशनल एयरपोर्ट की स्थापना हुई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, भारत सरकार (एएसआई) बरसात का मौसम शुरू होने के बावजूद इन्हें जलभराव से बचाने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर सका है। नतीजतन, इनका क्षरण होगा और स्वरूप भी बदलेगा। हालांकि, पुरातत्व विभाग का यह तर्क है कि पानी में डूबने से धरोहरों को कोई विशेष क्षति नहीं होती। बरसात खत्म होने पर उनकी मरम्मत कर दी जाएगी।
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कुशीनगर में मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर, मांथा कुंवर मंदिर और रामाभार स्तूप तीन प्रमुख दर्शनीय व पूजनीय पवित्र स्थल हैं। यहां करीब ढाई हजार साल पुराने उत्खनित धरोहर हैं। हर साल लाखों की संख्या में देश-विदेश के पर्यटक व बौद्ध अनुयायियों का दल भगवान बुद्ध के दर्शन के साथ विशेष पूजा-अर्चना के लिए यहां आता है। उनके आगमन से होटल, धर्मशाला व रेस्टोरेंट व्यवसायियों के अलावा चीवर, माला, फूल, अगरबत्ती बेचने वालों को अच्छी कमाई होती है। बारिश के मौसम में जब उत्खनित धरोहर व अवशेषों में पानी भर जाता है तो आने वाले पर्यटकों को निराशा होती है। उन्हें बिना देखे ही लौटना पड़ता है।

20 अक्तूबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लोकार्पण के लिए आगमन होना था। इसके अलावा उन्हें कुशीनगर में तीन दिवसीय बुद्धिस्ट कान्क्लेव व बरवां जंगल फार्म हाउस में विशाल जनसभा को संबोधित करने का कार्यक्रम था। उस समय यहां मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर, मांथा कुंवर मंदिर व रामाभार स्तूप परिसर के उत्खनित पुरावशेष व धरोहर पानी में डूबे थे। यह हाल देखकर जिला प्रशासन खासा परेशान था। काफी मशक्कत से लगातार कई दिनों तक विद्युत मोटरों को चलाकर धरोहरों से पानी को निकाला गया था। इस पर नगरपालिका कुशीनगर को अच्छी रकम भी खर्च करनी पड़ी थी।

कुशीनगर के इन पुरातात्विक महत्व के धरोहरों व पुरावशेषों की चिंता विभाग को सिर्फ बरसात के मौसम में ही होती है। बरसात के बाद वह भूल जाता है। अगर पुरातत्व विभाग के शीर्षस्थ अफसर गंभीरता व संजीदगी से सकारात्मक पहल करते तो उन्हें बारिश के पानी में डूबने से बचाया जा सकता है। पुरावशेषों के बारिश में डूबने की समस्या काफी लंबे समय से चली आ रही है। हर बरसात के मौसम में यह उम्मीद रहती है कि ये अब पानी में नहीं डूबेंगे। उन्हें पानी में डूबने से बचाने के लिए कोई न कोई इंतजाम कर लिया गया होगा। लेकिन धीरे-धीरे बरसात का मौसम आता है और उनमें जलभराव हो जाता है। फिर वही रटा-रटाया जवाब रहता है कि बरसात का मौसम खत्म होने के बाद क्षतिग्रस्त पुरावशेषों की मरम्मत करा दी जाएगी।

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नाकाफी साबित होता पुरातत्व विभाग का इंतजाम

पुरातात्विक धरोहरों व अवशेषों को बारिश के पानी में डूबने से बचाने के लिए विभाग का इंतजाम नाकाफी होता रहा है। अब तक पानी पंपिंग मशीन से ही निकाला जाता रहा है। विभाग का तर्क रहता है कि धरोहरों को पानी में डूबने से बचाने के लिए एक समग्र योजना के क्रियांवयन की जरुरत है, जिसे सिंचाई, नगर पालिका और कुशीनगर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (कसाडा) से ही पूरा किया जा सकता है, लेकिन अब तक इन विभागों के साथ कोई बातचीत नहीं हुई है। इसके चलते यह स्थिति की जस की तस है।

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ये हैं संक्षिप्त महत्व

- मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर दुनिया के पवित्र बौद्ध मंदिरों में से एक है। मंदिर में भगवान बुद्ध की 6.1 मीटर लेटी प्रतिमा है। यह प्रतिमा लाल बलुआ पत्थर से बनी है। इस मंदिर में हर साल पर्यटक और बौद्ध तीर्थ यात्री काफी संख्या में आते हैं।

- मांथा कुंवर मंदिर में भगवान बुद्ध की भू-स्पर्श मुद्रा में प्रतिमा है। मंदिर के सम्मुख उत्खनित धरोहर व अवशेष खुले में पड़े हैं। इनकी बौद्ध भिक्षु व उपासक व उपासिकाएं पूजा-अर्चना करती हैं।

- रामाभार स्तूप पवित्र बौद्ध स्थल है। बौद्ध धर्म के अनुयायी परिक्रमा करते हैं। कैंडल आदि जलाकर बौद्ध परंपरा के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना भी करते हैं। ध्यान भी करते हैं।
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कोट

उत्खनित धरोहर व पुरावशेषों का बारिश के पानी में डूबने का मुख्य कारण उनकी संरचना है। उन्हें बारिश के पानी से बचाने के लिए अब तक स्थाई प्रबंध नहीं किया जा सका है, पर पानी में न डूबें, अस्थाई रूप में विद्युत मोटर की मदद ली जाएगी।



-शादाब खान, संरक्षण सहायक, पुरातत्व विभाग, कुशीनगर
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