पडरौना। आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने के चलते अंग्रेजों ने निषाद जाति के लोगों को आदिवासी जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया। आजादी के बाद की सरकारों ने भी इस जाति के लोगों को जल, जंगल व जमीन का अधिकार नहीं दिया। अगले विधानसभा चुनाव में अपनी पहचान बनाने के लिए इस जाति के लोगों को एकजुट होना होगा।
ये बातें शनिवार को हाटा क्षेत्र के सकरौली गांव में आयोजित राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद व निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद ने कहीं। उन्होंने कहा कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम में कानपुर के सती चौरा घाट पर समाधान निषाद व लोचन निषाद के नेतृत्व में जुटे नाविकों ने करीब 3500 अंग्रेजों को नदी में डूबो दिया था। इससे नाराज अंग्रेजों ने निषाद जाति व उपजाति के लोगों पर क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए आदिवासी बना दिया था। आजादी के बाद निषाद जाति के उत्थान के लिए एक दर्जन से अधिक कमेटियां बनीं लेकिन किसी ने भी निषादों को जल, जंगल व जमीन पर मालिकाना हक नहीं दिलाया। संगठन ने कुछ वर्ष पहले मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने के बाद कसरवल में आंदोलन किया तो प्रशासन ने गोली चलवा दी। एक नौजवान की मौत का सारा दोष भी आंदोलनकारी लोगों पर ही मढ़ दिया गया।
बैठक में जय सिंह निषाद, प्रवीण निषाद, बिजय निषाद, उर्मिला निषाद, रामकेवल निषाद, रामधारी निषाद, मोहन निषाद समेत तमाम लोग मौजूद थे।