पडरौना। गंडक नदी का मिजाज 15 सालों में पूरी तरह बदल चुका है। पहले जो नदी तीन से चार लाख क्यूसेक पानी आने पर भी शांत रहती थी, अब वह महज एक से डेढ़ लाख क्यूसेक डिस्चार्ज पर खतरे के निशान को छूने लग रही है। नदी के पेट में जमा गाद और किनारों के कटाव ने इसके रास्ते को इतना उथला और संकरा कर दिया है कि कम पानी में भी तटबंधों के किनारे बसे गांवों के लोगों में खतरे की आहट से उनकी धड़कनें बढ़ जा रही हैं।
गंडक नदी के एपी तटबंध के किनारे बसे गांवों के रहने वाले जेके सिंह, हीरालाल यादव, मथुरा सिंह, रमेश यादव, पुजारी सिंह, प्रभुनाथ यादव, दीनानाथ सिंह बताते हैं कि 15 से 20 साल पहले नदी एपी व नरवाजोत तटबंध से तीन किलोमीटर दूर प्रवाहित होती थी। ऐसे में डिस्चार्ज तीन से चार लाख क्यूसेक होने पर भी बांधों को कोई खतरा नहीं होता था लेकिन अब नदी हर साल करीब 200 मीटर रास्ता बदलकर एपी और नरवाजोत तटबंध के पास से प्रवाहित हो रही है। नदी के धारा बदलने से अहिरौलीदान के चार और पिपराघाट के तीन गांव पहले ही विलीन हो गए थे और कई गांव आंशिक रूप से प्रभावित हो गए।
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2012 से हो रहा नदी के मार्ग में बदलाव
सेवरही क्षेत्र में गंडक नदी नरवाजोत से अहिरौलीदान तक करीब 17.500 किलोमीटर में बहती है। पहले बांध और नदी के बीच सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद थी। वर्ष 2012 में नदी के जलप्रवाह परिवर्तन से बैरिया टोला, एकरी टोला, कंचन टोला, चित्तू टोला और कचहरी टोला, डीह टोला, खैरखूंट मदरही व नोनिया पट्टी आंशिक रूप से कटान की भेंट चढ़ गए। गंडक के कटान से पिपराघाट ग्राम सभा का भूगोल बदल गया। यहां का फल टोला, नान्हू टोला व गोवर्धन टोला का अस्तित्व ही खत्म हो गया। वहींए तवकल टोला, दहारी टोला, भंगी टोला में नदी बांध से सटकर कर बह रही है।
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बोले विशेषज्ञ:-
गंडक नदी द्वारा लाए जाने वाले अवसाद का विभिन्न नदी-खंडों में जमाव, नदी की वहन क्षमता में कमी, तली के स्तर में परिवर्तन और नदी की धारा में होने वाले बदलाव जलप्रवाह को प्रभावित करते हैं। ऐसी ही स्थिति गंडक नदी की है। नदी के ऊपरी एवं निचले जलग्रहण क्षेत्रों में वर्षा, जलस्तर प्रवाह, अवसाद परिवहन और तट कटाव की नियमित निगरानी से अवरोध होना भी प्रवाह में परिवर्तन की वजह हो सकता है। -प्रो.कौस्तुभ नारायण मिश्र, विभागाध्यक्ष भूगोल, बुद्ध पीजी कॉलेज कुशीनगर
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गंडक नदी में विनाशकारी बाढ़ नेपाल की पहाड़ियों पर बारिश के बाद पानी के डिस्चार्ज से आती है। इससे पहले कई गांव नदी में समा चुके हैं और कई पर खतरा मंडरा रहा है। भौगोलिक दृष्टि से गंडक नदी के जलप्रवाह मार्ग में परिवर्तन की वजह जलधारा के वेग, गुरुत्वाकर्षण और नदी के अपने मार्ग परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति है। -सुरेश प्रसाद गुप्त, प्रवक्ता, भूगोल, बुद्ध इंटर कॉलेज,कुशीनगर
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तटवर्ती इलाके के लोग बोले
जलप्रवाह की दिशा लगातार तटबंध की ओर बढ़ रही है। यह खतरे का संकेत है। विशेषज्ञों से राय-मशविरा कर बाढ़ खंड के जिम्मेदारों को ठोस पहल करने की जरूरत है। सिर्फ बांध मरम्मत के लिए ठोकर, बोल्डर बिछाने आदि के अलावा मूल कारण को दूर करने पर ठोस काम होना चाहिए ताकि नदी तटबंधों से दूर प्रवाहित हो। यह बदलाव अचानक से नहीं हुआ है, वर्षों में धीरे-धीरे हुआ है। -राम ईश्वर निषाद,पिपराघाट
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बाढ़ के पानी के साथ भारी मात्रा में नदी में सिल्ट जमा हो गया है। ऐसे में बाढ़ खंड सहित एक्सपर्ट की मदद से जमा सिल्ट की सफाई कराई जाए तो कुछ हद तक राहत मिल सकती है। मौजूदा समय में भी नदी में कुछ जगहों पर सिल्ट दिखाई दे रही है। ऐसे में नदी वहां प्रवाहित होने की जगह से मार्ग बदलकर बह रही है। -हरिहर प्रसाद, नरवाजोत
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गंडक नदी अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के हिसाब से प्रवाहित हो रही है। ऐसे में जलप्रवाह को प्रभावित करने वाली मानवीकृत संरचनाओं से अवरोध उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसलिए तटवर्ती इलाकों के लोगों के बचाव के लिए हर संभव इंतजाम पूरे हैं। तटबंधों के किनारे कहीं पर कोई खतरा नहीं है। -एमके सिंह, एक्सईएन, बाढ़ खंड,गोरखपुर