कसया। विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी बौद्ध कालीन हिरण्यवती नदी के जीर्णोद्धार के लिए चल रही मुहिम का अब तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आ पाया है। नदी की हालत अब भी जस की तस बनी हुई है। साफ-सफाई से लेकर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बनी योजनाएं कागज में ही सिमट कर रह गई हैं। नदी अभी भी जलकुंभी से भरी है। साफ पानी की जगह विभिन्न मुहल्लों के गंदे नाले का पानी ही इसमें आता है।
कहा जाता है कि हिरण्यवती नदी के किनारे ही भगवान बुद्ध ने महानिर्वाण प्राप्त किया था। जल स्रोत बंद होने से यह नदी अब विलुप्त होने की कगार पर है। बौद्घ धर्म के लोगों की आस्था से जुड़ी इस नदी के अस्तित्व को कायम रखने के लिए समय-समय पर प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बौद्ध भिक्षुओं की अगुवाई में योजनाएं बनाकर कार्य करने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। नदी में जगह - जगह कस्बे का गंदा पानी गिर रहा है और सफाई के अभाव में यह जलकुंभी से भरी है।
बीते वर्ष डीएम रहे शम्भु कुमार ने इस नदी के जीर्णोद्धार के लिए मनरेगा के धन से सफाई, पाथ वे, पौधरोपण, स्ट्रीट लाइट लगाने सहित जल संरक्षण की मुहिम चलाई थी। नदी के किनारे रामाभार स्तूप के नजदीक पौधरोपण भी किया गया। साढ़े तीन किलोमीटर तक मनरेगा मजदूरों से सफाई भी कराई गई। परंतु कार्य अधूरा रह जाने के चलते नदी धीरे-धीरे फिर पुरानी स्थिति में पहुंचने लगी है। प्रशासन ने अब तक इस नदी में गिर रहे गंदे नालों को रोकने के लिए भी कोई दूसरा प्रबंध नहीं किया।