पडरौना। राम कथा के माध्यम से वैदिक संस्कृति के प्रचार प्रसार का संकल्प लिया है। भारतीय संविधान के प्रथम पृष्ठ पर सीता राम का चित्र अंकित है, जो भारत राष्ट्र में सनातन संस्कृति की मजबूत जड़ों का द्योतक है। संकट काल में सभी उसी तरह साथ छोड़ देते हैं, जैसे चंद्रमा पर संकट आने पर उनके 12 नक्षत्र साथ छोड़ते हैं। जब चंद्रमा के साथ ऐसा हो सकता है, तो कलयुग में किसी के भी साथ हो सकता है। संकट से मुक्ति के लिए सनातन संस्कृति में प्रभु की भक्ति इसीलिए महत्वपूर्ण है।
ये बातें तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहीं। वे तुर्कपट्टी क्षेत्र के सेमरा धाम में रामकथा के छठे दिन श्रद्धालुओं को रामकथा सुना रहे थे। उन्होंने कहा कि पत्नी को पति का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा का साथ नहीं छोड़ता। रोहिणी नक्षत्र एक तरह से माता सीता का प्रतिनिधि है। इसी कारण बनवास में होने के बाद भी सीता ने भगवान राम के साथ को नहीं छोड़ा। पिता पुत्र के संबंधों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम एक ऐसे पुत्र थे, जिन्होंने कभी पिता दशरथ की इच्छा का उल्लंघन नहीं किया। यही कारण है कि हर रिश्ते की परिभाषा राम से शुरु होती है। राम पर ही खत्म होती है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान अपने साथ हुए उत्पीड़न की चर्चा करते हुए जगद्गुरु की आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा कि उसी समय मैंने संकल्प लिया कि यह देह रहे या न रहे, राम मंदिर के लिए सबकुछ समर्पित कर दूंगा।
इससे पहले कुशीनगर चेयरमैन प्रतिनिधि राकेश कुमार जायसवाल, चेयरमैन किरण जायसवाल, प्रणय शुक्ला, अंजलि शुक्ला, अजय राय, अल्पना शुक्ला, दीपक द्विवेदी आदि के चरण पादुका और व्यास गद्दी के पूजन के बाद कथा शुरु हुई। सांसद कुशीनगर विजय दुबे, विधायक शलभ मणि त्रिपाठी, राजेश्वर सिंह, हाटा विधायक मोहन वर्मा, रामकोला विधायक विनय प्रकाश गौड़ आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। इस दौरान राणा सिंह, प्रमोद पांडेय, शैलेंद्र तिवारी, प्रमोद सिंह, अनिल प्रजापति आदि मौजूद रहे।