विद्याधर तिवारी
खड्डा। महदेवा गांव में बीतेे सोमवार को लगी आग ने 35 परिवारों को खुले आसमान के नीचे एक पतली सी प्लास्टिक की छांव के अंदर सिमटकर रहने के लिए विवश कर दिया है।
इस गांव के तीन युवकों की शादी अब टलने के आसार पैदा हो गए हैं, तो दूसरी ओर स्कूल जाने वाले बच्चों के कॉपी-किताब जल जाने से उनकी पढ़ाई बंद है। जले हुए घर को निहार कर रहे खुले आसमान में रहने को विवश आग प्रभावित लोगों के लिए आगे की जिंदगी मुश्किल हो गई है।
महदेवा गांव में 11 अप्रैल को लगी आग से यहां के 35 परिवारों के समक्ष गंभीर संकट पैदा कर दिया है। इनमें से कुछ परिवार ऐसे हैं जिनके यहां बेटों की शादी होने वाली है। आग की घटना में बेटों की शादी धूमधाम से करने के लिए खरीदकर रखे सामान भी जलकर नष्ट हो गए। अब शादी तो दूर फिलहाल रहने के लिए ठौर की तलाश करनी पड़ रही है। तपती दोपहरी में प्लास्टिक के घर में रह पाना मुश्किल होता जा रहा है।
ऊपर से दो जून के भोजन की व्यवस्था के लिए जतन करनी पड़ रही है। गांव के शारदा के दो बेटों वीरेंद्र और शीशमल की शादी होने वाली है। इसके लिए बड़े ही अरमान से एक-एक चीज जोड़कर घर में रखे गए थे। अचानक सब कुछ उनके सामने ही जल गये। परेशान शारदा कहते हैं कि सोचा था कि बेटों की शादी के बाद बेटी की शादी करके जिम्मेदारी से मुक्त हो जाऊंगा लेकिन बेटों की शादी कैसे होगी, अभी यही चिंता सता रही है।
इसी तरह बेवा मराछी के लड़के की भी शादी होने वाली है। उसके भी सभी अरमान आग की घटना में जल गए। उसके समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे घर बनेगा और कैसे बेटे की शादी देख पाएगी। गांववालों के समक्ष भी सबसे बड़ी समस्या घर बनाने की है। फूस का घर बनाने के लिए जरूरी खर पतवार, बांस आदि भी नहीं मिलने से समस्या गंभीर हो गई है। आसपास के गांवों में जाकर बांस मांगना पड़ रहा है।
आग की घटना से प्रभावित कुछ लोग गांव से सटे बिहार के गांवों में भी मदद के लिए चक्कर लगा रहे हैं। गांव के 70 वर्षीय रामलखन कहते हैं कि आग की घटना में उनका सारा अनाज जल गया। आग की घटना ने अंदर से तोड़ दिया है। आगे कैसे जिंदगी कटेगी यह नहीं समझ आ रहा। अस्सी साल के बृक्षा अभी भी बदहवासी की हालत में हैं।
वह कहते हैं कि इस उम्र में कैसे घर बनाएं और कैसे अपना जीवन व्यतीत करें, समझ में कुछ नहीं आ रहा है। 65 साल की बुजुर्ग भुअली देवी कहती हैं कि आग की घटना में उनका सारा समान जल गया। किसी तरह से तीन बोरी धान निकल पाई थी, वह भी पता नहीं किसने चुरा लिया। बुजुर्ग कुंती देवी कहती हैं कि ग्राम प्रधान ने अपने पास से सभी लोगों को तीन दिन तक भोजन कराया, नहीं तो बड़ी दिक्कत हो जाती। अब आगे के लिए संकट पैदा हो गया है। ग्रामीण शिव बताते हैं कि इस साल पांच क्विंटल लहसुन हुआ था और मसूर, बकला भी हुआ था।
सोचा था बेचकर परिवार का पालन पोषण करेंगे लेकिन एक झटके में जल कर नष्ट हो गया। गांव की महिला रूखी देवी जले हुए धान से एक-एक दाना चुनकर रख रही थीं। उनका तीन साल का अशक्त बेटा भूख से बेहाल था। उसके शरीर का कपड़ा तक जल गया। नंगे बदन जमीन पर लोट रहे बच्चे का पालन पोषण कैसे होगा, रूखी के समक्ष यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है।
गांव के बच्चों की पढ़ाई ठप हो गयी है। प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले सोनू, धीरज, जय कुमार, सागर, रीतेश, ज्योति, मोनू, कलुआ, अनिल सहित तमाम बच्चों के कापी किताब आग की घटना में जल गए। ये बच्चे अब स्कूल पढ़ने नहीं जा रहे हैं।
ग्राम प्रधान जीतेंद्र बताते हैं कि प्रशासन की तरफ से सात हजार नौ सौ रुपये का चेक प्रति परिवार वितरित किया गया है। आग से प्रभावित लोगों की पीड़ा असहनीय है। अपने स्तर से जितना करते बन रहा है, कर रहे हैं। आग से प्रभावित लोगों को प्राथमिकता के आधार पर लोहिया आवास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि कुछ तो सहयोग हो जाए।