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Kushinagar News: आयुष्मान योजना में भ्रष्टाचार का घुन, जांच में भी लीपापोती

Wed, 29 Jan 2025 11:24 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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पडरौना। आयुष्मान योजना में भ्रष्टाचार का घुन लग गया है। जिम्मेदारों की मिलीभगत से आयुष्मान योजना में शामिल मरीजों के इलाज में फर्जीवाड़ा करने से अस्पताल संचालक बाज नहीं आ रहे हैं। बिहार के फर्जी रिपोर्ट के आधार पर पडरौना में आयुष्मान मरीजों के ऑपरेशन करने का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और आयुष्मान योजना के लिए कार्य कर रही साचिस संस्था ने कोर्ट के आदेश पर आयुष्मान योजना में अस्पताल को शामिल कर लिया। जिन अस्पतालों का रास्ता नहीं बना वे अपने अस्पताल का नाम बदलकर विभागीय जिम्मेदारों की मिलभगत से रजिस्ट्रेशन कराने के बाद आयुष्मान योजना में शामिल हो गए। भ्रष्टाचार के मामले में छोटे कर्मचारी जेल भेजे गए। जबकि जिनकी शह पर फर्जीवाड़ा और ब्लैकमेलिंग का खेल चल रहा था, वे पुलिस की कार्रवाई से बच निकले।
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प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना में भ्रष्टाचार और अस्पताल संचालकों को ब्लैकमेल का खेल सीएमओ कार्यालय से चल रहा था। साइबर सेल की जांच में पता चला कि संविदा पर तैनात डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कोआर्डिनेटर (डीपीसी) के पद पर तैनात डॉ. दीपक कुशवाहा और ऑडिटर पद पर तैनात अखिलेश शर्मा, कंप्यूटर ऑपरेटर मंदीप गौड़ इस खेल में मास्टर माइंड थे। डीपीसी डॉ. दीपक कुशवाहा कार्यालय के जिम्मेदारों की शह पर ऐसा कराता था और इसके एवज में मोटी रकम वसूलता था। साइबर सेल की टीम ने डॉ. दीपक समेत पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, इसमें आयुष्मान योजना के ऑडिटर पद पर तैनात एक कर्मचारी भी आरोपी था, जिसकी गिरफ्तारी अभी तक नहीं हो सकी है। दीपक कुशवाहा और अखिलेश शर्मा के कहने पर आयुष्मान योजना में शामिल नेबुआ नौरंगिया के अस्पताल, पडरौना के बीएन हॉपिस्टल और नेबुआ नौरंगिया थाना क्षेत्र के आराध्या सर्किल हॉस्पिटल की आईडी पर अश्लील वीडियो आरोपी अनीस अपलोड कराकर ब्लैकमेल करता था। दोनों अस्पताल संचालकों ने सीएमओ से शिकायत करने के बाद केस दर्ज कराया था।
डॉ. दीपक कुशवाहा ने पुलिस की पूछताछ में सीएमओ कार्यालय से जुड़े कई जिम्मेदारों का नाम लिया था, मामला बढ़ता देख सीएमओ के निर्देश पर टीम दोनों अस्पतालों पर गई और मानक में कमी दिखाते हुए आयुष्मान योजना से निलंबित करा दिया। संचालकों पर दबाव बनाकर अपने बचाव में नोटरी बयान हल्फी भी स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों ने ले ली। अभी तक आराध्या सर्किल हॉस्पिटल को आयुष्मान योजना से नहीं जोड़ा जा सका है, जबकि बीएन हॉस्पिटल को कोर्ट के आदेश पर आयुष्मान योजना में शामिल कर लिया गया है। वहीं खुशी अस्पताल को भी आयुष्मान योजना में शामिल करने का आदेश हाईकोर्ट का है, लेकिन अभी सीएमओ कार्यालय की ओर से इसकी रिपोर्ट नहीं भेजी गई है।
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इसके अलावा सुकरौली में संचालित सावित्री अस्पताल भी आयुष्मान योजना में संचालित था। इसे भी निलंबित करते हुए आयुष्मान पैनल से बाहर कर दिया गया था। कुछ दिन बाद उसी स्थान न्यू सावित्री के नाम से इस हॉस्पिटल का रजिस्ट्रेशन करने के बाद आयुष्मान योजना में शामिल करा दिया गया। कोटवा के साईं अस्पताल को भी आयुष्मान योजना के पैनल से बाहर कर दिया गया था, बाद में ऊं साई हॉस्पिटल के नाम से इसका रजिस्ट्रेशन सीएमओ कार्यालय में किया गया और आयुष्मान योजना में शामिल कर लिया गया है। इसके अलावा जिले में फर्जी तरीके से आयुष्मान कार्ड बनाने का मामला सामने आ चुका है, इस मामले में भी सीएमओ कार्यालय की ओर से जांच की गई थी। कार्रवाई के बजाए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
इस तरह से आयुष्मान योजना में स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। डीएम विशाल भारद्वाज ने बताया कि नव जीवन ज्योति हॉस्पिटल का मामला सामने आने के बाद जांच कराई जा रही है। जांच की प्रक्रिया लंबी है इसलिए समय लग रहा है। उस अस्पताल में आयुष्मान या किसी अन्य बीमारी के मरीजों का ऑपरेशन हुआ है। उनसे टीम को संपर्क कर हकीकत जानने का निर्देश दिया गया है। अभी कुछ कहना जल्दीबाजी होगी।
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संविदा कर्मी के गले में सोने की मोटी चेन, कार से ऑफिस आना चर्चा का विषय
सीएमओ कार्यालय में तैनात कई संविदाकर्मी आज भी ऐसे हैं, जिनका मानदेय 15 से 20 हजार रुपये हैं, लेकिन गले में सोने की मोटी चेन और चार पहिया वाहन से ऑफिस पहुंचते हैं। निजी अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन का पटल देखने वाले बाबू से लेकर डिप्टी सीएमओ तक इनके इशारे पर नाचते हैं। निजी अस्पतालों की जांच के लिए नोडल अधिकारी, कंप्यूटर ऑपरेटर और मलेरिया इंस्पेक्टर, जिसका चाहते हैं, उसका ही काम होता है। इस खेल के पीछे विभागीय जिम्मेदारों की शह है, दोनों संविदाकर्मी अवैध तरीके से संचालित निजी अस्पताल और अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालकों के साथ पार्टनर भी हैं। इसकी शिकायत पहले भी उच्चाधिकारियों तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन इनकी मजबूत पैठ के कारण कार्रवाई से जिम्मेदार परहेज करते हैं। विभागीय अफसरों के आवास पर देर तक यह जमे रहते हैं और इनके इशारे पर ही विभाग में पत्ता हिलता है। सब कुछ जगजाहिर होने के बाद भी विभागीय जिम्मेदार कार्रवाई से परहेज करने के साथ-साथ उच्चाधिकारियों को भी गुमराह करने वाले जानकारी दे रहे हैं।
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