इस कुनबे में 12 वर्ष की उम्र में आते हो जाते हैं दिव्यांग
दिव्यांगता के चलते से पांचवीं तक पढ़ सकी मां सिलाई करके परिवार चलाने में करती हैं सहयोग
सरकारी सुविधा के नाम पर सिर्फ शौचालय और अंत्योदय कार्ड का मिला है लाभ
सुमंत कुशवाहा
पकड़ियार बाजार (कुशीनगर)। क्षेत्र में एक ऐसा भी परिवार है, जिसमें 12 वर्ष की उम्र में आते-आते बच्चे दिव्यांगता के शिकार हो जा रहे हैं। आर्थिक विपन्नता से जूझ रहे इस कुनबे के दो बच्चों के साथ ऐसा ही हुआ। मां तो बचपन से ही दिव्यांगता के चलते अभिसप्त जीवन जी रही है, बेटे और बेटी भी एक-एक करके इसके शिकार बन गए। दोनों पांचवी कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाए। 16 से 18 वर्ष की उम्र में भी उन्हें घर से दूर जाने के लिए पिता की गोद का सहारा लेना पड़ रहा है। सरकारी सुविधा के नाम पर इन्हें सिर्फ शौचालय और अंत्योदय कार्ड ही नसीब हो सका है। दिव्यांग भाई-बहन ट्राईसाइकिल की आस में बृहस्पतिवार को ब्लॉक मुख्यालय पहुंचे थे।
नेबुआ नौरंगिया क्षेत्र के पचफेड़ा गांव के निवासी बांके मिश्रा पेशे से किसान हैं। खेती से होने वाली आय से ही परिवार का गुजर-बसर होता है। पत्नी कुसुम देवी बचपन से ही दिव्यांग हैं। दिव्यांगता की वजह से ही वह पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सकीं। सिलाई करके गृहस्थी संचालित करने में पति का सहयोग करती हैं। कुसुम देवी को इस बात का मलाल है कि दिव्यांगता उनके लिए अभिशाप बन गई है। बेटा अनुज जन्मा तो 12 साल तक बिल्कुल स्वस्थ था। अचानक एक दिन उसे बुखार हुआ और उसके बाद कमजोरी बढ़ गई, जिससे उसके दोनों पैर दुर्बल होते गए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार डॉक्टरों से इलाज कराए, लेकिन अनुज फिर अपने पैरों में खड़ा नहीं हो पाया। आज वह 18 साल का हो चुका है, लेकिन घर से दूर ले जाने के लिए पिता को उसे गोद में टांगकर ले जाना पड़ता है।
ऐसी ही घटना बेटी नेहा के साथ भी घटी। बचपन में वह भी स्वस्थ थी। अन्य बच्चों की तरह पढ़ना और खेलना-कूदना उसकी भी दिनचर्या थी, लेकिन बारह वर्ष की उम्र में आकर वह भी बड़े भाई की तरह दिव्यांग हो गई। हालत यह है कि 16 वर्ष की उम्र में बैसाखियों के सहारे भी ज्यादा दूर नहीं जा पाती।
पोलियो ड्रॉप पिलाया गया था, टीके भी लगे थे
बृहस्पतिवार को ब्लॉक मुख्यालय पर अपने दोनों दिव्यांग औलादों के साथ मिली कुसुम देवी ने बताया कि बचपन में पोलियो ड्रॉप पिलाने के साथ-साथ सभी टीके लगाए गए थे। फिर भी न जाने कौन सा रोग लग गया कि उनकी जिंदगी इतनी कष्टदायी हो गई।
कोटवा से ब्लॉक कार्यालय तक गोद में टांगकर लाए पिता
बांके मिश्रा ने बताया कि कोटवा तक तो बच्चों को सवारी से लेकर आए, लेकिन वहां से ब्लॉक मुख्यालय के कैंपस तक एक-एक कर गोद में टांगकर ले आए। उन्होंने बताया कि पत्नी की दिव्यांगता के चलते तो पहले ही परेशान थे, अब बच्चों की इस दशा ने सुख-चैन छीन लिया है। सुविधा के नाम पर सिर्फ एक शौचालय और अंत्योदय कार्ड ही मिल पाया है। दो बीघा खेत है, जिसका कुछ हिस्सा बंधक रखकर थोड़ा घर बनवाया, जिस पर सीमेंट की शेड रखी है। उसी के नीचे गुजर-बसर होता है। उन्होंने बताया कि ब्लॉक मुख्यालय पर ट्राईसाइकिल वितरण के लिए कैंप लगा था, जिसमें इनका चिह्नांकन कराने आए थे।
इस परिवार में दिव्यांगता की यह समस्या क्यों आ रही है, इस बारे में जानकारी लेने के लिए सीएमओ और जिला विकलांग कल्याण अधिकारी को भेजा जाएगा। ताकि इनके समुुचित इलाज की व्यवस्था और अन्य सुविधाएं दिलाई जा सकें। -डॉ. अनिल कुमार सिंह, जिलाधिकारी।