गंडक की धारा से तटबंध से दूर रखने के लिए बने स्पर (ठोकर) क्षतिग्रस्त हो गये हैं।
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गंडक की धारा से तटबंध से दूर रखने के लिए बने स्पर (ठोकर) खुद ही क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। शुरूआती दौर में 250-350 मीटर तक लंबे इन स्परों का अधिकांश हिस्सा अब नदी में विलीन हो चुका है। कुछ जगहों पर स्पर मात्र 40 से 50 मीटर के ही बचे हैं। स्परों की घटती लंबाई से नदी बंधे के नजदीक पहुंचती जा रही है। अगर यही स्थिति रही तो इस वर्ष एपी तटबंध पर कई जगह नदी की धारा बंधे से सीधे टकराएगी और तब बंधे को बचा पाना बहुत मुश्किल होगा।
गंडक के सर्वाधिक संवेदनशील तटबंध अहिरौलीदान-पिपराघाट (एपी) की लंबाई लगभग 17 किलोमीटर है। इस बंधे पर करीब 20 स्पर (ठोकर) बने हैं। बाढ़ खंड डिवीजन के अभियंताओं के अनुसार ये स्पर नदी की धारा को परिवर्तित करने का कार्य करते हैं। करीब 250 से 350 मीटर तक लंबाई वाले बंधे के अगले हिस्से (नोज) पर बोल्डर होता है। नदी की धारा इस अगले हिस्से से टकराती रहती है। माना जाता है कि अगर स्पर मजबूत है तो नदी की धारा उनसे टकराकर बंधे से दूर चली जाती है।
हर साल बरसात बाद बाढ़ खंड डिवीजन बंधे की मरम्मत के साथ ही इन स्परों के क्षतिग्रस्त हिस्सों को भी ठीक कराने के लिए बजट स्वीकृत कराता है, लेकिन अधिकांश जगहों पर कार्य नहीं कराए जाते हैं। स्थिति यह है कि नरवाजोत एक्सटेंशन के पास बने दो स्परों की लम्बाई अब महज 40 से 50 मीटर तक ही रह गई है। इसी तरह घघवा जगदीश, जवहीं दयाल, बिन टोली, बाघाचौर, झवनिया टोला, विरवट कोन्हवलिया, नवका टोला, बाक खास, नोनियापटटी व अहिरौलीदान के सामने बने स्पर भी जर्जर हो चुके हैं।
हर साल इनकी लंबाई घटती जा रही है। नदी के किनारे बसे गांवों के निवासी बाबूलाल निषाद, सुधीर यादव, मथुरा सिंह, सीताराम निषाद, डॉक्टर जेबी सिंह आदि का कहना है कि पिछले एक दशक से इन स्परों की मरम्मत का कार्य नहीं कराया गया है। इसके चलते नदी की धारा बंधे के नजदीक आती जा रही है। अगर यही स्थिति रही तो बाढ़ आने पर बंधों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इस संबंध में बाढ़ खंड डिवीजन के अधिशासी अभियंता बीपी सिंह का कहना है कि जरूरत के अनुसार स्परों की मरम्मत का कार्य कराया जाता है। धनाभाव के चलते कुछ कार्य नहीं हो पाए हैं। बरसात के दिनों में सभी संवेदनशील स्थानों नजर रखी जाती है।