फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खेती को माना चारों धाम

Mon, 24 Mar 2014 05:30 AM IST
Kushinagar
विज्ञापन
विज्ञापन
पिपराबाजार। आजकल खुद को पढ़ा-लिखा मानने वाले बहुत से लोग खेत में काम करने को अपनी तौहीन समझते हैं, वहीं 72 वर्ष की उम्र के सिद्धेश्वर दुबे को इसमें गर्व महसूस होता है। इन्हें खेत में काम करता देख कोई सहज ही साधारण किसान समझ सकता है, जबकि ऐसा है नहीं। यह इंटरमीडिएट कॉलेज के रिटायर्ड प्रधानाचार्य हैं और औसतन एक हजार रूपये रोज की मासिक पेंशन पाते हैं। इनकी लगन, उद्यम और दिनचर्या बहुत से आरामतलब नौजवानों और बुजुर्गों को प्रेरणा देने वाली है। खेती के लायक जमीन रहते हुए भी खाने के लिए अनाज खरीदने की लज्जा ने रसायन विज्ञान में स्नात्कोत्तर सिद्धेश्वर दुबे को माटी से लगाव का संकल्प दिया। इन्होंने ईश्वर की सत्ता में अगाध विश्वास रखते हुए भी तीर्थ-व्रत की बजाय कर्म को महत्व दिया।
विज्ञापन

विशुनपुरा क्षेत्र के सरपतही खुर्द गांव के पास सिद्धेवर दुबे के खेतों में लहलहाती फसलें इनके पुरुषार्थ का परिचय देती हैं। पितामह पंडित शिवप्रसाद दुबे अपने जीवनकाल में दूर-दूर तक विद्वता के कारण विख्यात थे। हालांकि पिता पंडित गंगाधर दुबे अध्ययनशील व्यक्ति थे, किंतु पांच वर्षीय पुत्र सिद्धेश्वर की मां के निधन ने उन्हें एकाकी बना दिया। नि:संतान चाचा मंगला धर दुबे और चाची भूला देवी ने बिन मां के बच्चे का दायित्व संभाला। पडरौना के उदित नारायण क्षत्रिय इंटरमीडिएट कॉलेज से 1957 में हाईस्कूल पास करने वाले सिद्धेश्वर दुबे ने बाद के वर्षों में गोरखपुर विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में एमएससी किया। 1966 में प्रवक्ता के रूप में दुबे को उदित नारायण क्षत्रिय इंटरमीडिएट कॉलेज में नियुक्ति मिली। चालीस वर्षों तक अध्यापन के बाद वर्ष 2006 में यह प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हो गए। परिवार में शिक्षा की प्रधानता के कारण अध्ययन, अध्यापन पर विशेष जोर था। सिद्धेश्वर दुबे बताते हैं कि खेती योग्य जमीन थी, किंतु कृषि कार्य में कोई बहुत रुचि नहीं लेता था। खेतों से कुछ अनाज आ जाता था, अधिकांश खरीदने की नौबत रहती थी। यदि प्रकृति बिल्कुल विपरीत न हो जाए तो किसान के लिए अन्न खरीदना दुबे को कलंक लगता है। नौकरी से रिटायर होने के बाद इन्होंने खेतों को ही कर्मक्षेत्र बनाया है। वह बताते हैं कि मौसम कोई भी हो, भोर के पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक सक्रिय रहना इनकी दिनचर्या है। रक्तचाप की मामूली समस्या के लिए होम्योपैथिक दवा के अलावा यह कोई दूसरी दवा नहीं लेते। वह शुगर और जोड़ों में दर्द जैसे रोगों से मुक्त रहने के पीछे खुद के खेतों में परिश्रम को कारण बताते हैं। रसायन विज्ञान पढ़ने-पढ़ाने के दौरान लगातार प्रयोग करने की जरूरतों ने इन्हें खेती में भी प्रयोगों के लिए प्रेरित किया। आवश्यकता के हिसाब से कुदाल, फावड़े, हसिया, खुर्पों का संकलन इनकी विशेषता है। आसपास के बहुत से मजदूर और किसान भी इनके कृषि कार्य संबंधी औजारों के संकलन की दाद देते हैं। पडरौना नगर के चिकित्सक डॉक्टर विपिन बिहारी चौबे, डॉक्टर बीके सिंह, डॉक्टर संदीप अरुण आदि आज भी अपने गुरु सिद्धेश्वर दुबे का जिक्र शुरू होते ही शिक्षण में उनकी लगन को रेखांकित करना नहीं भूलते। सिद्धेश्वर दुबे कहते हैं कि धरती का सीना चीरकर अपने पसीना से माटी सींचने वाले किसान का दर्जा किसी पेशे के व्यक्ति से कम सम्मानित नहीं, लेकिन इनकी समस्याओं पर सच्चे दिल से कोई गौर नहीं करता, यह बड़ा दुर्भाग्य है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें