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बाघों की तादाद में इजाफा

Wed, 18 Sep 2013 05:36 AM IST
Kushinagar
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पडरौना। दुनिया में बाघों की घटती संख्या पर जताई जा रही चिंता के बीच एक राहत भरी खबर आई है। यूपी-बिहार और नेपाल की सीमा पर 900 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में हाल के वर्षों में बाघों की तादाद में जोरदार इजाफा हुआ है। करीब तीन साल पहले इस टाइगर रिजर्व में जहां बाघों की संख्या महज आठ थी, वहीं अब यह 22 हो गई है। बाघों के साथ यहां अन्य वन्य जीवों की भी संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। हालांकि इसमें दुखद पहलू यह है कि गैंडों की संख्या में कमी आई है।
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2008 में वन प्रमंडल एक और दो के सभी वन क्षेत्रों में केंद्र सरकार की ओर से बाघों की गणना कराई गई थी। तब इस इलाके में 10 बाघों के होने की पुष्टि हुई थी। 2010 में बाघों की संख्या घटकर आठ हो गई थी। इसी वर्ष एक बाघ के शिकार का मामला सामने आया था जिसे केंद्र सरकार ने भी गंभीरता से लिया था। वन विभाग के पास संसाधनों के अभाव में वर्ष 2011-12 में बाघों की गणना नहीं हो पाई थी। इस साल बाघों की गणना कराने पर इनकी संख्या में तीन गुना बढ़ोत्तरी का पता चला है। भारत सरकार के प्रयासों से आए विशेषज्ञों ने कैमरों के सहारे बाघों की गणना की है। वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के निदेशक संतोष तिवारी बताते हैं कि कैमरों के सहारे जंगल में 22 बाघों के होने की जानकारी मिली है। इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भी दी गई है। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई है कि बाघों की संख्या एकाध और ज्यादा हो सकती है। वह कहते हैं कि यह दो साल के मैनेजमेंट के साथ ही वन्य जीवों के शिकार पर लगाए गए अंकुश का नतीजा है।
टाइगर रिजर्व के जंगलों में बाघों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार ने इस बार इसके इलाके के दायरे की बढ़ोत्तरी की है। जिन इलाकों में बाघ विचरण करते हैं, वहां लोगों का जाना वर्जित है। वह बताते हैं कि जंगल में शाकाहारी जानवराेें के लिए अब भोजन और हरी-भरी घासों की कमी नहीं है। जैसे-जैसे शाकाहारी जानवरों की संख्या बढ़ेगी, वैसे ही मांसाहारी जानवरों की तादाद बढ़ती है। शाकाहारी जानवरों के भोजन के लिए व्यापक प्रबंध किया जा रहा है। वन्य जीवों की संख्या बढ़ने पर उनकी हिफाजत के लिए कर्मचारियों की भी संख्या बढ़ाई जा रही है।
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...लेकिन गैंडों के लिए आफत
हालांकि इस जंगल में बाघ सहित अन्य वन्य जीवों की संख्या भले बढ़ी है पर गैंडों की तादाद में कमी आई है। सात साल पहले यहां छह गैंडे थे। कुछ साल पहले यूपी के क्षेत्र में दो गैंडे नहर में डूबकर मर गए। उसके कुछ दिनों बाद एक गैंडा ट्रेन हादसे का शिकार हो गया। अभी पांच माह पहले एक और गैंडा ट्रेन की चपेट में आकर मर गया। इस समय यहां केवल दो ही गैंडे बचे हैं।
2010 में शिकार का मामला सामने आया था
2010 में यहां बाघ के शिकार का एक मामला सामने आया था। उस समय जंगल में शिकारी ने पंजा लगाकर रखा था, जिसमें फंसने से एक बाघ की मौत हो गई थी। उस घटना को वन विभाग से लेकर केंद्र सरकार तक ने काफी गंभीरता से लिया था। लिहाजा यहां काफी चौकसी बढ़ाई गई। तब से बाघ के शिकार का कोई मामला प्रकाश में नहीं आया।
और कई दुर्लभ जानवर हैं यहां
यह हमारे लिए फख्र की बात है। इस वन्य क्षेत्र में 22 बाघों के अलावा सौ से ज्यादा भालू, सौ के आस-पास लैपर्ड, लगभग इतने ही फिशिंग कैट, करीब 50 मगरमच्छ, तीन अलग-अलग प्रजातियों के जंगली नेवले और सभी प्रजातियों के हजारों की संख्या में हिरण भी हैं। वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के निदेशक संतोष तिवारी बताते हैं कि जिस पीले गले वाले मार्टिन के बारे में पहले यह माना जाता था वे पूरे भारत में नहीं पाए जाते हैं, उनकी भी यहां मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं। तिवारी बताते हैं कि बाघों की तरह इन जानवरों की भी तादाद बढ़ रही है।
आबादी में भी आते-जाते हैं बाघ
इस जंगल के बाघ अक्सर इस इलाके से निकलकर आबादी में भी आ जाते हैं। करीब छह माह पूर्व पडरौना शहर के आसपास आबादी में आकर कई लोगों को घायल करने वाला बाघ भी इसी जंगली से भटककर आया था। बाद में वन विभाग के कर्मचारियों के काफी प्रयासों के बाद उसे फिर से इस जंगल की ओर खदेड़ा गया। इसके पहले और अभी दो माह पूर्व हनुमानगंज और खड्डा तथा गंडक नदी के किनारे वाले कुछ गांवों में लोगों ने बाघ को देखा था।
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