नदी के किनारे शेड से अब पर्यटकों को वहां पर बैठने अथवा मौसम खराब होने पर किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके निर्माण में 750 किलोग्राम स्टील की रॉड का उपयोग किया गया है। निर्माण में लोहे का उपयोग नहीं किया गया है। इस निर्माण में लगभग आठ लाख रुपये की रकम खर्च हुई है।
19वीं शताब्दी में कुशीनगर की खोज के साथ ही हिरण्यवती नदी के इतिहास की जानकारी हुई। उसके बाद बौद्ध अनुयायियों और प्रशासन स्तर से प्रयास कर नदी के जीर्णोद्धार के लिए काम होते रहे। इस कड़ी में जिले में पूर्व में रहे डीएम लोकेश एम. एवं शंभू कुमार के अलावा प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक सुब्बाराव समेत कई लोगों ने सफाई के लिए काफी प्रयास किया है।
कुशीनगर में आयोजित टेंपल एरिया मैनेजमेंट कमेटी की बैठक में बौद्ध भिक्षुओं की तरफ से नदी के किनारे तेज धूप, गर्मी और बरसात के मौसम में साधना और पूजा अर्चन करने के लिए शेड की मांग की गई थी। बौद्ध भिक्षुओं की मांग पर ही उन्होंने कसाडा को फाइबर शेड लगवाए जाने का निर्देश दिया था। इसी परिप्रेक्ष्य में कसाडा बुद्धा घाट पर यह फाइबर शेड लगवाया है।