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सियाचीन ग्लेशियर में शहीद हुए थे अरूण शाही

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उपेक्षा के चलते शहीद स्मारक अधूरा
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फोटो के साथ
बेटे की सहादत पर गर्व पर व्यवस्था को कोस रहे परिजन
16 अगस्त 2004 को शहीद हुए थे अरूण कुमार शाही
मनोज कुमार गिरि
हाटा। उपेक्षा के चलते शहीद लांस नायक अरूण कुमार शाही की याद में बनने वाला शहीद स्मारक अब तक अधूूूरा है। दो बार निर्माण कार्य शुरू जरुर हुआ, लेकिन प्रशासनिक और जनप्रतिनिधियों की घोर उपेक्षा के चलते 14 वर्षों बाद भी निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया। जिसकी वजह से शहीद के परिवार और गांव वाले व्यवस्था को कोस रहे है।
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हाटा कोतवाली क्षेत्र के पड़री गांव के रहने वाले तहसीलदार शाही के पुत्र अरूण कुमार शाही 20 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना का हिस्सा बने थे। वर्ष 2004 में वह लांस नायक के पद पर सियाचीन ग्लेशियर में तैनात थे। वर्ष 2004 में पूरा देश आजादी की वर्ष गांठ मना रहा था। उसी दौरान स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद ही 16 अगस्त 2004 को अरूण कुमार शाही आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के दौरान ग्लेशियर की एक चट्टान खिसकने के कारण उसके चपेट में आ गए और वही शहीद हो गए। उनकी शहादत की खबर जब परिवार के लोगों को मिली तो मानों परिवार पर बज्रपात हो गया। परिवार के साथ साथ पूरा गांव इस बेटे की शहादत पर गम में था, लेकिन फर्क भी था कि बेटे ने देश के लिए अपनी जान कुुर्बान की है। शव गांव आया तो परिवार के लोगों ने बेटे का अंतिम संस्कार अपने पुस्तैनी जमीन में करने का निर्णय लिया। अंतिम संस्कार में प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होने आए तत्कालीन कैबिनेट मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने प्रदेश सरकार की ओर से घोषणा की थी कि गांव और गांव की सड़क शहीद के नाम किया जाएगा। इसी के साथ अंतिम संस्कार स्थल पर शहीद की याद में शहीद स्मारक बनवाया जाएगा। घोषणा के चार वर्ष बाद विकास खंड की ओर से शहीद स्मारक बनवाने का कार्य शुरू कराया गया, लेकिन केवल नीव बना कर काम बंद हो गया। तब से अभी वह अधूरा पड़ा हुआ है। इस बात को लेकर शहीद का परिवार आहत है। पिता तहसीलदार शाही ने बेटे की तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहा कि बेटा तो देश के लिए शहीद हुआ, इसका हमे गर्व है, लेकिन सरकार के नुमाइंदे शहीदों के यादों से भी खिलवाड़ कर रहे है। बेटे की शहादत के बाद से सरकार की ओर से की गई सभी घोषणाएं हवां हवाई हो गई। प्रदेश सरकार की ओर से घोषित न तो पांच लाख की सहायता राशि मिली और न ही शहीद की याद में स्मारक ही बन सका। हमे इन सरकारों को कुछ नहीं कहना है। ये सब बताते हुए उनकी आंखे नम हो गई।
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