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पर्यावरण दिवस पर विशेष..

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बालू के टीले पर उगा दिया सागौन का जंगल
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फोटो है
फाजिलनगर ब्लॉक के गौराखोर गांव के लोगों ने असंभव को किया संभव
पर्यावरण संरक्षण के साथ ही ये पेड़ किसानों की आय का स्रोत बन गए हैं

सुनील कुमार सुमन
तुर्कपट्टी (कुशीनगर)।
सकारात्मक सोच के साथ प्रयास किया जाए तो असंभव को संभव बनाया जा सकता है। ऐसे लोगों के लिए मिट्टी भी सोना उगलती है। इसे साबित किया है फाजिलनगर ब्लॉक के गौराखोर गांव के लोगों ने। यहां नदी के तट तथा बेकार पड़ी ऊसर भूमि ही नहीं बालू के टीले तक को लोगों ने मेहनत से सागौन का जंगल बना दिया है। पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ये पेड़ किसानों की आय का बड़ा स्रोत बन गए हैं।
करीब डेढ़ दशक पहले फाजिलनगर ब्लॉक के गौराखोर निवासी पूर्व अभियंता रामशंकर सिंह तथा नवजीवन इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य व्यास सिंह ने पुश्तैनी पीले बालू के टीले (धुस) पर कुछ फलदार तथा करीब तीन हजार सागौन के पौधे लगाए। सड़क के दोनों तरफ लगे ये पौधे पांच वर्ष में ही छायादार हो उठे। पर्यावरण संरक्षण सहित आमदनी का जरिया बन रहे इन पेड़ों को देखकर गांव और क्षेत्र में पेड़ लगाने की होड़ मच गई। कुछ ही वर्षों में नरसिंह सिंह, राजीव सिंह, जयप्रकाश, वीरेंद्र, विश्वनाथ सिंह आदि के अलावा पड़ोसी गांव लवकुश के पूर्व प्रधान योगेंद्र सिंह व कंपनी सिंह आदि ने सड़क के दोनों तरफ अपनी जमीन में करीब आधा किलोमीटर तक सौगन के पौधे लगा दिए। अब यह पूरा क्षेत्र सागौन के जंगल जैसा दिखता है। घना होने के चलते गर्मी के दिनों में राहगीर यहां छांव पाते हैं तथा दूर तक फैले पेड़ों के विशाल जंगल को देखकर लोग आनंदित भी होते हैं।
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गौराखोर गांव के लोगों की मुहिम का असर अगल-बगल के गांवों पर पड़ने लगा है। गुरवलिया लाला के महेंद्र दुबे, डॉ. रामानंद श्रीवास्तव, शेखवा टोली के नत्थू अली, जयप्रकाश सिंह, विश्वनाथ सिंह, महासोन के राणा सिंह, रमेश त्रिपाठी, धुनवलिया के मनोज मिश्रा, प्रमोद मिश्रा, ओमप्रकाश मिश्रा, रुदवालिया के पारस आदि ने सागौन, आम, पीपल, महोगनी आदि के हजारों पौधे लगा दिए हैं। अधिकांश लोगों ने घाघी नदी के तट पर बेकार पड़ी पुश्तैनी भूमि को पर्यावरण संरक्षण तथा आर्थिक संरक्षण का माध्यम बनाया है। गुरवलिया के महेंद्र दुबे, धुनवलिया के मनोज मिश्रा ने बताया कि शुरू में लगा कि यह काफी मेहनत का कार्य है, लेकिन कम संसाधन में आज सैकड़ों पेड़ तैयार हैं।
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लोगों की प्रतिक्रिया...
सामाजिक कार्यकर्ता दीप नरायण अग्रवाल का कहना है कि अब वृक्ष क्रांति की जरूरत है। पशु व मत्स्य पालन आदि की तरह वृक्ष लगाने वाले को भी अनुदान दिया जाना चाहिए, जिससे वृक्षारोपण अभियान बन सके। बेहतर होता कि सरकार बेकार पड़ी जमीनें किसानों को लीज पर देकर पेड़ लगवाती। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ गरीब तबके का आर्थिक विकास भी होगा।
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एसबीएमपीजी कॉलेज फाजिलनगर के समाज शास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. इंद्रजीत मिश्रा का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक आंदोलन बनाने की जरूरत है। पूर्वज पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी जागरूक थे। देश की महान विभूतियों के नाम पर गांव और कस्बों में उपलब्ध भूमि पर वन विकसित किया जाना चाहिए। बेहतर होता कि छात्रवृत्ति की तरह स्कूल-कॉलेजों में पौधों का भी उपहार दिया जाय।
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नवजीवन इंटर कॉलेज पटहेरवा के पूर्व प्रधानाचार्य व्यास सिंह ने कहा कि शैक्षिक जीवन से अवकाश के बाद यह पेड़ उनके विद्यार्थी हैं। सुबह-शाम यह प्रश्न पूछते हैं और मैं जवाब देता हूं। शुरू में कुछ कठिनाइयां हुईं लेकिन अब इनके बीच सुकून मिलता है। भावी पीढ़ी को स्वच्छ पर्यावरण तथा मजबूत आर्थिक आधार देना हम सभी की जिम्मेदारी है। मुझे खुशी है कि अपने अभियान में थोड़ी सफलता मिल सकी है।
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ग्राम पंचायत महासोन निवासी राणा सिंह ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण की चर्चाओं ने पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित किया। विभिन्न प्रजाति के करीब पांच सौ पौधे अब तक लगा चुका हूं। इस सीजन में दो एकड़ जमीन पर पौधे लगाने की योजना है। आने वाली पीढ़ी को बेहतर वातावरण देने के साथ आर्थिक संरक्षण भी पेड़ों से संभव है।
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