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आधी आबादी का भरोसा तोड़ते रहे मतदाता

Tue, 17 Jan 2017 12:03 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
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 जिले में महिलाएं ब्लाक प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्ष तो बनीं, लेकिन विधायक न बन सकीं। ऐसा नहीं कि इनको मौका नहीं मिला। मौके कई मिले, लेकिन मतदाताओं का भरोसा नहीं जीत सकीं। मतदाताओं ने पुरुषों को तवज्जो देकर राजनीति में इनको हासिए पर ही रखा। भाजपा को छोड़कर बड़े दलों ने भी इन पर विश्वास नहीं किया। महिलाएं निर्दलीय उम्मीदवार के ही रूप में मैदान में उतरती रहीं।
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   जिले की तीनों सीटों पर महिलाएं चुनाव लड़ती रहीं हैं। इसकी शुरूआत वर्ष 1962 में हुए चुनाव से हुई थी। चायल सीट पर पीएसपी की प्रत्याशी चौधरी नौनिहाल सिंह को कांग्रेस की उम्मीदवार कमल कुमारी गोइंदी ने तगड़ी टक्कर दी थी, लेकिन कमल कुमारी गोइंदी को कामयाबी नहीं मिली थी। इसके बाद चायल से 1977 में राधा देवी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरीं थी। इसके बाद 1989 में चायल से ही चुन्नी देवी, 1991 में मंझनपुर से कमला देवी, 1996 में लक्ष्मी देवी लड़ी चुकी हैं। चायल सीट से वर्ष 2002 में भाजपा ने पुष्पा देवी को मैदान में उतारा। पुष्पा देवी को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में बसपा के दयाराम जीते थे। वर्ष 2007 में भाजपा ने मंझनपुर सीट से पुष्पा देवी को उतारा, लेकिन पुष्पा देवी को हार का ही सामना करना पड़ा। सिराथू से भी महिलाएं चुनाव लड़ीं थीं, लेकिन मतदाताओं का उनको साथ नहीं मिला।

आरके चौधरी को मंजू चंद्रा ने दी थी टक्कर
वर्ष 1994 को मंझनपुर सीट पर उपचुनाव हुआ था। पूर्व मंत्री आरके चौधरी बसपा से लड़े थे। भाजपा ने पूर्व मंत्री के खिलाफ मंजू चंद्रा को उतारा था। यह चुनाव काफी रोचक हुआ था, लेकिन मंजू चंद्रा को हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 2007 में भाजपा ने इसी सीट से पुष्पा देवी को उतारा था, लेकिन वह भी चुनाव नहीं जीत सकी थीं।
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