पीएम ने दावा किया था कि 50 दिन के भीतर सब सामान्य हो जाएगा। अभी पांच दिन बचे हैं लेकिन स्थिति सामान्य होती नहीं दिख रही है। यह नोटबंदी का ही असर है कि बथुवा, सोया व मेथी रुपये के बजाय अब पैसे में बिकने लगी है। हमेशा अपने भाव में रहने वाला आलू अब बिना भाव हो गया है। मंडियों में आलू दस रुपये में साढ़े तीन किलो चिल्ला-चिल्ला कर बेचा जा रहा है। नोटबंदी का कहर यह है कि सब्जियों के दाम इतने सस्ते हो गए हैं कि किसानों को अपनी लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। थोक के व्यापारी छोटी मंडियों में पहुंचकर फुटकर में सब्जी बेच रहे हैं।
सिराथू व मूरतगंज, मिरदहन का पुरवा, मीठेपुर सयारा, भदवां, झंडापुर, गोविंदपुर गोरियों, सौंरई, भड़ेसर, बसोहनी, हाजीपुर पतौना समेत अधिकांश गांवों में सब्जी की खेती होती है। यहां के किसान नगदी रुपया कमाने के चक्कर में इस खेती पर ज्यादा जोर देते हैं। आलू से लेकर हर प्रकार की सब्जी तैयार की जाती है। अब तो फ्रेंच बिंस भी कौशाम्बी में पैदा होने लगी है। मौसम ने साथ दिया था, इसलिए सब्जी की पैदावार ठीक हुई, लेकिन ऐन वक्त नोटबंदी की ऐसी मार पड़ी कि किसानों के सारे अरमानों पर पानी फिर गया। मजदूर लगाकर खेती करने वाले किसान खुद ही हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं। सब्जी के दाम गिरने से वह मजदूरों को दिहाड़ी देने की स्थिति में नहीं है।
ओसा मंडी हो अथवा अझुवा। भरवारी बाजार हो करारी। सभी प्रमुख बाजारों में सब्जियां भी आती हैं और खरीदार भी, लेकिन दाम में इतना अंतर आ गया है कि शाम तक सब्जी बेचने के बाद किसान अपनी मेहनत भी नहीं वसूल पाता, लागत तो दूर की बात है। शनिवार को मूरतगंज बाजार में बथुवा, सोवा, मेथी और हरी धनिया 25 पैसे गड्डी में बेचा गया यानि एक रुपये में चार गड्डी। किसानों ने यह कत्तई नहीं सोचा था कि उन्हें इतना बुरा दिन देखना पडे़ेगा। इसी बाजार में शनिवार को पल्हाना के कल्लन दस रुपये में साढ़े तीन किलो आलू चिल्ला-चिल्ला कर बेच रहे थे। पांच साल बाद आलू का दाम इतना नीचे गिरा है। लोगों को इस दाम में आलू बिकने की उम्मीद ही नहीं थी। मिर्च का भी दाम अचानक तेजी से नीचे गिरा है। दिल्ली, गाजियाबाद तक यहां से मिर्च भेजी जाती थी, लेकिन अबकी आढ़ती ही नहीं आए हैं।