फौकॉल्ट पेंडुलम, स्रोत इंटरनेट मीडिया
हर साल आठ जनवरी को पृथ्वी घूर्णन दिवस मनाया जाता है। यह दिन फ्रांसीसी भौतिकशास्त्री लियोन फौकॉल्ट के उस ऐतिहासिक प्रयोग को याद दिलाता है, जिसने पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण दिया था। फौकॉल्ट के इस प्रयोग को उस समय विज्ञान जगत में बड़ी उपलब्धि माना गया, क्योंकि इससे पहले पृथ्वी के घूर्णन को लेकर सिर्फ सिद्धांतों पर निर्भरता थी।
चायल स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री इंटर काॅलेज के भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता भीष्म चंद्र ने बताया कि फौकॉल्ट ने आठ जनवरी 1851 को पेरिस के प्रसिद्ध पैंथियन में अपना प्रयोग किया। उन्होंने एक लंबी तार से भारी गेंद लटकाकर एक साधारण पेंडुलम बनाया। पेंडुलम के झूलने की दिशा में धीरे-धीरे बदलाव देखा गया, जो वास्तव में पृथ्वी के घूर्णन का प्रमाण था।
पेंडुलम स्थिर रहता है लेकिन नीचे की जमीन (पृथ्वी) घूमने से उसकी दिशा बदलती प्रतीत होती है। इस प्रयोग ने न केवल पृथ्वी के घूमने को साबित किया, बल्कि दिन-रात के चक्र, मौसम परिवर्तन और समय क्षेत्रों की वैज्ञानिक समझ को भी मजबूत आधार दिया।
उन्हाेंने बताया कि मौजूदा समय में दुनिया भर के विज्ञान संग्रहालयों में फौकॉल्ट पेंडुलम की प्रतिकृतियां लगाई गई हैं। लोग इन्हें करीब से देखकर इस अद्भुत घटना को समझते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पृथ्वी का घूर्णन धीरे-धीरे कम हो रहा है, जिससे दिनों की लंबाई बढ़ रही है। चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण यह प्रक्रिया जारी है।
यह दिवस हमें हमारे ग्रह की गतिशीलता की याद दिलाता है और पर्यावरण संरक्षण की जरूरत पर भी जोर देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के घूर्णन में बदलाव जलवायु परिवर्तन से भी जुड़े हो सकते हैं।