बेरुवा गांव में आग की लपटों की भेंट चढ़ी शिवांशी की किलकारियां हमेशा के लिए थम गईं। सोती बच्ची जब आग की चपेट में आई तो उसे रोने का भी मौका न मिला। सोते-सोते चली गई।
पिता शिव कुमार बताते हैं कि हर दिन की तरह शनिवार को भी शिवांशी तड़के उठ गई थी। उनकी नींद खुली तो बेटी का मुस्कुराता चेहरा देखकर कुछ देर तक उसे दुलारा। इसके बाद वह काम पर जाने के लिए तैयार होने लगे। सुबह जल्दी उठने के कारण बेटी करीब सात बजे दोबारा सो गई। पत्नी नेहा उसे कमरे में सोफे पर लिटा दिया और कमरे से बाहर अपने काम में जुट गई।
शिव कुमार मजदूरी के लिए गांव के बाहर पहुंचे ही थे कि घर से फोन आया कि बेटी आग में झुलस गई है। वह भागते हुए घर पहुंचे, तब तक परिजन बच्ची को अस्पताल ले जा चुके थे। अस्पताल पहुंचने पर उन्हें मौत की खबर मिली।
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बहुत ऊपर तक ले जाने का सपना था साहब
शिव कुमार ने रुंधे गले से बताया कि उनकी इकलौती बेटी ही उनके लिए सब कुछ थी। वह पढ़े-लिखे नहीं हैं। मजदूरी के लिए भी कई बार भटकना पड़ता है। उनकी इच्छा थी कि मेहनत करके बेटी को पढ़ाएंगे और उसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचाएंगे। साहब, बहुत ऊपर तक ले जाने का सपना था अपनी बिटिया को। यह कहते हुए वह फफक पड़े। उन्होंने बताया कि बच्ची के नाना-नानी भी उसे पढ़ा-लिखाकर आगे बढ़ते देखना चाहते थे। लेकिन परिवार के सारे सपने जल गए।