मिट्टी के दिये को सहेजती श्यामलता। स्रोत- स्वयं
महिला सशक्तीकरण की मिसाल बनीं श्यामलता ने अपने पारंपरिक हुनर को न सिर्फ जीवित रखा बल्कि उसे रोजगार का जरिया भी बना लिया है। परिवार के सहयोग से वह मिट्टी के दीये और मूर्तियां बनाकर हर महीने चार से पांच हजार रुपये तक की कमाई कर रही हैं।
मूरतगंज की रहने वाली श्यामलता ने 2021 में एक स्वयं सहायता समूह का गठन किया था। इसके बाद उन्होंने परंपरागत तरीके से दीये बनाने का काम शुरू किया। करीब दो साल पहले इन्होंने मूर्ति निर्माण का कार्य शुरू किया। इस वर्ष दीपावली के मौके पर उन्होंने करीब पांच हजार रुपये की गणेश-लक्ष्मी मूर्तियां बनाकर बेचीं। उनकी मूर्तियां पूरी तरह मिट्टी की होती हैं जिससे स्थानीय बाजार में इनकी मांग बनी रहती है।
श्यामलता बताती हैं कि परिवार के सदस्य बाहर जाकर बिक्री की जिम्मेदारी नहीं उठा पाते। इस कारण कारोबार सीमित दायरे में ही रह गया है। उन्होंने बताया कि पारंपरिक हाथ से चलने वाला चाक भी बड़ी परेशानी की वजह है। इस बार वह जिला उद्योग केंद्र में इलेक्ट्रॉनिक चाक के लिए आवेदन करने की योजना बना रही हैं। इसके मिलने के बाद समय और मेहनत दोनों की बचत होगी।
श्यामलता का कार्य पारंपरिक और प्रेरणादायक है। विभाग की ओर से चाक उपलब्ध कराने में उनकी मदद की जाएगी। इससे वह अपना काम और बेहतर तरीके से कर सकेंगी।- दिव्यांशु सिंह, जिला समन्वयक, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन