दुल्हनियापुर और उसरापर गांव में महीनों से तैयारियां चल रहीं थीं। किसी ने धूमधाम के साथ बहू लाने की सोची थी, किसी ने शान से बहन विदा करने की। दर्दनाक हादसे ने दोनों पक्षों के अरमानों पर पानी फेर दिया। सात फेरे तो हुए पर बेटी विदा न हुई। जिस गांव में अर्थी उठी, वहां कैसे जाती। दुल्हनियापुर वालों का अब बहू का इंतजार करना पड़ेगा।
कोखराज के उसरापर की रहने वाली अमृता और कौशाम्बी के दुल्हनियापुर के रहने वाले पिंटू का रिश्ता करीब एक साल पहले तय हुआ था। कई महीनों से दोनों परिवार तैयारियों में जुटे थे। अमृता के भाई रमेश ने करीब एक हजार लोगों के खाने का इंतजाम किया था। घर के पास ही खेत में पंडाल गया था। इसी में जयमाल की व्यवस्था थी।
वर के पिता सम्मारीलाल प्रजापति भी एक बस व कई चार पहिया वाहनों से करीब 120 बरातियों के साथ अपनी बहू लेने आए थे। शादी की रौनक बढ़ाने के लिए चरवा के काजू से डीजे बुक कराया था। सब कुछ वैसा ही हो रहा था, जैसा दोनों परिवारों ने सोचा था। इसी बीच शाम को अचानक हुई बारिश में उसरापर में लगे शादी के पंडाल की तैयारियां धुल गईं।
इसके बाद भी रमेश व उनके परिजनों ने घरातियों व बरातियों के स्वागत में कोई कमी नहीं आने दी। जैसे-तैसे करीब 600 लोगों को भोजन कराया। देर रात जब डीजे वाहन में करंट उतरने की घटना हुई तो दोनों परिवारों की खुशियाें पर पानी फिर गया।
सुबह सात बजे द्वारचार, नौ बजे हुए फेरे
अमूमन हिंदुओं की शादी में शाम को द्वारचार फिर जयमाल और रात में विवाह की रस्में पूरी कराई जाती हैं। फिर सुबह बहू विदा होती है। लेकिन उसरापर में घटना के बाद जैस-तैसे विवाह की सिर्फ रश्म अदायगी हुई। सुबह सात बजे दूल्हे के साथ परिवार के चंद लोग पहुंचे। नौ बजे सात फेरे हुए फिर 11 बजे बिना दुल्हन बरात विदा हो गई।
जहां से अर्थी निकल रही हो वहां कैसे आती बहू की डोली
सुबह बरात तो विदा हुई तो वर के पिता सम्मारीलाल प्रजापति ने कहा कि मेरे ही गांव में एक साथ दो भाइयों की अर्थी उठ रही थी। ऐसे दुखदायी मौके पर मेरी बहू की डोली पहुंचेगी तो अच्छा नहीं लगेगा। एक सप्ताह बाद विदाई होगी।