परिषदीय विद्यालयों से नाम कटने के बाद बच्चों का दोबारा नामांकन कराना शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। शासन के निर्देश पर ड्रॉप आउट बच्चों को खोजकर मुख्य धारा से जोड़ने का अभियान चल रहा है। जबकि कई बच्चे अब स्कूल लौटने को तैयार नहीं हैं।
स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे स्कूल से निकलकर यदि दोबारा कहीं नामांकन नहीं कराते तो वह विद्यालय के ड्रॉप आउट बाक्स में देखते रहते हैं। जिले के 1096 परिषदीय विद्यालय में पढ़ने वाले करीब 720 बच्चे ऐसे हैं जिनका नाम विभाग के ड्रॉप आउट श्रेणी में दिख रहा है। इनमें 391 बालक व 329 बालिका हैं।
ऐसे में विभाग इनको दोबारा विद्यालय लाने पर जोर दे रहा है। यह कार्य शिक्षकों के लिए कठिन साबित हो रहा है। तमाम बच्चे ऐसे हैं जो किसी न किसी कारण से विद्यालय आने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में शिक्षकों के लिए दोबारा नामांकन कराना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
बीआरसी सरसवां के शाहपुर गांव में दो बच्चियों की दो साल पहले मौत हो चुकी है। एक की बीमारी से और दूसरी ने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। बावजूद इसके, उनके नाम अभी भी सूची में प्रदर्शित हैं। एक विद्यालय के शिक्षक ने बताया कि इन नामों की पुष्टि के लिए दो बार फोन आया। पहले ब्लॉक से और फिर जिले से। इसी तरह अन्य विद्यालयों के शिक्षक भी ड्रॉप आउट बच्चों को खोजने में परेशान हैं।
प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष अनिल कुमार सिंह ने बताया कि जिलाध्यक्ष बच्चों को खोजकर उनका पुन: नामांकन कराने का निर्देश दिया गया है लेकिन यह काम बेहद कठिन है। कई परिवार पलायन कर चुके हैं। कुछ बच्चे और माता-पिता अन्य जिलों में काम कर रहे हैं। विभाग केवल आंकड़े पूरा कराने में जुटा है, शिक्षकों की दिक्कतें कोई नहीं सुन रहा है।
वहीं, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के जिला संयोजक ओमदत्त त्रिपाठी ने बताया कि शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव बनाकर ड्रॉप आउट डाटा खाली कराया जा रहा है। कुछ शिक्षक डर और दबाव में काम कर रहे हैं। कुछ दिनों बाद परीक्षा है। यदि जांच में उपस्थिति कम और नाम अधिक मिले तो कार्रवाई का डर है। वहीं कुछ शिक्षकों ने बताया कि विभागीय दबाव में काम का बोझ बढ़ गया है, जबकि समस्या जमीनी स्तर पर हल नहीं हो पा रही है।
- शिक्षकों को ड्रॉप आउट बच्चों के पुन: नामांकन कराने का निर्देश दिया गया है। इस कार्य में सफलता भी मिल रही है। जहां ज्यादा परेशानी है। उसका समाधान निकालने का प्रयास हो रहा है। शासन के निर्देश पर ही यह कदम उठाया गया है। - डॉ. कमलेंद्र कुशवाहा, बीएसए