अंग्रेजों हुकूमत के दौर से चली आ रही सात दिन तक होली खेलने की परंपरा सरायअकिल में अब भी कायम है। खास बात यह है कि सातों दिन अलग-अलग रंगों से अलग-अलग अंदाज में लोग रंगों का यह त्योहार मनाते हैं।
कस्बे के रहने वाले 80 वर्षीय सजनलाल मिश्र बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत करीब 200 साल पहले जमींदार जालिम सिंह ने की थी। पहले पखवाड़े भर होली मनाई जाती थी। वर्ष 1910 में जमींदार के प्रपौत्र ताल्लुकेदार रामकृपाल सिंह ने सात दिन होली मनाने की प्रथा शुरू कर दी। इसमें पहले दिन कस्बे में रंग खेला ही नहीं जाता। खरीदारी व अन्य तैयारियां होती हैं। दूसरे दिन से रंग खेलने की शुरुआत होती है।
95 वर्षीय गामा हलवाई बताते है कि सातों दिन अलग-अलग मोहल्ले में रंग खेला जाता है। जिस मोहल्ले में होली खेलनी होती थी वहां एक दिन पहले जमींदार मुनादी कराते थे। तय दिन पर पहले होलियारों का झुंड बैलगाड़ी में भांग और ठंडई लेकर ढोल, मजीरा, झांझ के साथ अबीर गुलाल उड़ाते और नाचते-गाते गलियों से गुजरता था।
जिस मोहल्ले का फाग गायन होता था, वहां लोग ड्रमों में रंग घोलकर पहले से तैयार रहते थे। सादगी के साथ एक दूसरे को रंग लगाते थे। आखिरी दिन थाने में त्योहार का समापन होता है। यह परंपरा आज भी कायम है। बस आधुनिकता के दौर में होली खेलने का स्वरूप थोड़ा बदल गया है। अब सादगी की जगह हो-हल्ले ने ले लिया है।
इस तरह मनाई जाती सात दिनी होली
पहला दिन- होलियारे जगह-जगह होली गीतों पर नाचते गाते एक दूसरे पर लाल रंग की बौछार करते हैं।
दूसरा दिन- हरा रंग ड्रमों में घोला जाता है। फिर पिचकारियों से लोग रंग डालकर एक-दूसरे को सराबोर कर देते हैं।
तीसरा दिन- होलियारे अलग-अलग टोलियां बनाकर मोहल्लों में जाते हैं और पीले रंग से होली खेलते हैं।
चौथा दिन- यह दिन नीले रंग का होता है। युवाओं तरह-तरह के स्वांग रचकर त्योहार का आनंद उठाते है।
पांचवां दिन- गुलाबी रंग से ही होली खेली जाती है। पूरे नगर में होलियारे झूमते-नाचते हुए निकलते हैं।
छठवां दिन- इस दिन सिर्फ अबीर और गुलाल का प्रयोग होता है। गली-गली में फाग का गायन होता है।
सातवां दिन- आखिरी दिन सभी रंगों से लोग होली खेलते हैं। कस्बे में घूम-घूम कर एक दूसरे को बधाई देते हैं।