विहिप के जिलाउपाध्यक्ष दुर्गेश श्रीवास्तव और उनकी पत्नी आरती।
90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन जोरों पर था। भरवारी के खल्लाबाद में विहिप के जिला उपाध्यक्ष दुर्गेश श्रीवास्तव और उनकी पत्नी आरती श्रीवास्तव भी कारसेवा के लिए अयोध्या गए थे। दुर्गेश बताते हैं कि कारसेवकों का जोश देख लगता था कि उनकी रगों में खून नहीं, बल्कि रामभक्ति का संचार हो रहा हो।
दुर्गेश श्रीवास्तव कहते हैं कि तब मैं विहिप का जिला मंत्री और पत्नी दुर्गा वाहिनी की मूरतगंज की संयोजिका की जिम्मेदारी संभाल रहीं थीं। वर्ष तो याद नहीं, लेकिन बात विवादित ढांचा गिराए जाने के पहले की है। अयोध्या में हजारों कार्यकर्ता जुटे थे। संगठन की ओर से मंदिर के निर्माण का आह्वान किया गया था।
कारसेवकों ने सिंहद्वार से निर्माण शुरू किया था। सबसे पहले द्वार पर चबूतरा बनाया। किसी के हाथ में फावड़ा था तो किसी के हाथ में तसला। काम तेजी से चल रहा था। सरकार इसे बंद कराने का दबाव बना रही थी।
विहिप नेता बताते हैं कि देश ही नहीं विदेश की मीडिया भी इस आंदोलन पर नजर रख रही थी। बीबीसी लंदन के रिपोर्टर केवल यह देखना चाहते थे कि विहिप काम बंद कराती है या नहीं। काम रोका भी जाता है तो कारसेवकों की उस पर प्रतिक्रिया क्या रहती है। गहमागहमी और जय श्रीराम के नारों के बीच कारसेवकों की भीड़ चबूतरे के निर्माण में जुटी थी।
तभी विहिप के नेता अशोक सिंघल वहां आए। उन्होंने काम बंद करने का ऐलान कर दिया। उनके बोलते ही कारसेवकों के हाथों से फावड़ा और तसला छूट गया। विहिप के कार्यकर्ताओं में अनुशासन का यह नजारा देख बीबीसी लंदन के रिपोर्टर दंग रह गए। उन्होंने इसी मुद्दे पर अपने चैनल में खबर चलाई जो लंदन में भी देखी गई।