मंझनपुर।‘भय प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी। हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप विचारी। लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषण वनमाला नयन विशाला शोभासिंधु खरारी’। मानस की इसी चौपाई के साथ राम कथा के चौथे दिन मंगलवार को संत मोरारी बापू ने भक्तों को श्रीराम जन्मोत्सव की कथा का रसपान कराया।
महाकवि तुलसीदास को राममय बनाने वाली उनकी अर्द्धांगिनी रत्नावली के गांव महेवाघाट में संत कृपा सनातन संस्थानकी ओर से आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के चौथे दिन समूचे कथा पंडाल में बधाई गीत गूंजे। भजन और चौपाई के साथ जब मोरारी बापू ने जगतनाथ प्रभु श्रीराम के जन्म की जानकारी दी तो पंडाल में मौजूद श्रोता भाव विभोर हो गए। कथा प्रसंग का ऐसा अनूठा नजारा बना मानों रत्नावली धाम में भगवान राम ने फिर से जन्म ले लिया हो। भय प्रगट कृपाला चौपाई पर सारे श्रोता एक साथ खड़े होकर बधाई गीत गाने लगे। मोरारी बापू ने मानस और मनुष्य के जीवन महिमा का बखान किया। कहा अपनी गलती को पहचान कर उसे कुबूल करने में कभी हिचकिचाना नहीं चाहिए। जरा सा परिर्वतन होने पर जीवन बदल जाता है। शिव पार्वती विवाह का प्रसंग बताते हुए कहा कि शिवकथा ही रामकथा की पात्रता है। रत्नावली के आध्यात्मिक जीवन दर्शन का वर्णन किया। बताया कि कवितावली का हर प्रसंग रत्नावली है। भागवत कथा और मानस की आठ कलाएं थीं और यही सब मानस रत्नावली है। तुलसी जैसे जीव को परमात्मा से मिलाने वाली माया रत्नावली थी। पुरुष को पूर्ण होने के लिए 16 कलाओं की आवश्यकता होती है जबकि स्त्री को 15 कलाओं की। बापू ने कहा कि संसार में बहुत रत्न हैं। सुभाषित रत्न एक है। प्रवहवान व्यक्ति रत्न है। नदी कोई भी हो वह रत्न होती है। उपकारित कविता भी रत्न है जो हमारे मन के मैल को धोती है। कलियुग में राम नाम सबसे बड़ा रत्न है। जहां कथा होती है वहां प्राणवायु के रूप में हनुमान जी होते हैं। इससे सिद्ध हो जाता है कि श्रोता को परमात्मा की छाया लग जाती है। इस मौके पर आयोजनकर्ता मदन पॉलीवाल, प्रकाश पुरोहित, रवींद्र जोशी, रूपेश व्यास, विकास पुरोहित, मंत्रराज पालीवाल सहित तमाम लोग मौजूद रहे।