पौराणिक सरस्वती नदी के पेलियो चैनल (नदी की पुरानी शाखा) का गंगा-यमुना से जुड़े होने का पता चला है। इसके बाद वैज्ञानिकों ने प्रयागराज से कानपुर तक 100 से अधिक स्थान चिह्नित कर पौराणिक नदी में वर्षा जल संचयन के लिए जल मंत्रालय को रिपोर्ट भेजी है। अगले साल तक नमामि गंगे योजना के तहत इस पर काम शुरू होने की संभावना जताई जा रही है।
राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान हैदराबाद (एनजीआरआई) और केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्लयूबी) के वैज्ञानिकों ने विलुप्त सरस्वती नदी की खोज फरवरी-मार्च 2018 में प्रयागराज के संगम से शुरू की थी। यह खोज पश्चिम में 200 किलोमीटर आगे तकरीबन 10 हजार वर्ग किलोमीटर परिक्षेत्र में फतेहपुर और कानपुर के बिल्हौर व गजनेर तक पहुंच चुकी है।
एनजीआरआई के वैज्ञानिक सुभाष चंद्रा ने बताया कि हेलिकाॅप्टर के नीचे लगे हेलिबोन ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक उपकरण की मदद से जमीन के 500 मीटर भीतर की जलधारा का अध्ययन किया गया है। लाइव प्रतिरोधकता मैप से पता चला है कि विलुप्त पौराणिक नदी से निकली कई छोटी बड़ी पेलियो चैनल्स यमुना और गंगा नदी से जुड़तीं हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में 70 फीसदी से अधिक भूजल सिंचाई के काम में लिया जाता है। भूजल का अत्यधिक दोहन, अनियमित और कम वर्षा से पारिस्थितिक प्रवाह की कमी ने राज्य को गंभीर और चुनौतीपूर्ण स्थिति में डाल दिया है, इसलिए भूगर्भीय जल परिस्थितियों के अंतर्गत भूजल स्तर बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों को योजना बनाने की आवश्यकता है।
नदी को पुनर्जीवित करने के लिए परीक्षण परिक्षेत्र में बम्हरौली, फनगांव, सेंवथा, इछना, सरायअकिल, म्योहर, करारी, मंझनपुर, सिराथू समेत फतेहपुर के खागा और कानपुर के बिल्हौर व गजनेर तक 100 से अधिक स्थानों को चिह्नित कर बोरवेल किया गया है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि भूगर्भीय पेलियो चैनल्स और जमीन के भीतर का बालू भंडार एक एकीकृत तंत्र बनाता है, जो कि दूषित पदार्थों की छनाई कर पानी को उपयोगी बना सकता है।