जिला पंचायत के अध्यक्ष पद पर जिस बसपा का लगातार दो बार से कब्जा रहा था। वही बसपा इस बार जिपं अध्यक्ष चुनाव में मुकाबला तक नहीं कर सकी। 29 सदस्यों में से सिर्फ 4 सदस्यों ने ही पार्टी के पक्ष में वोट किया। इनमें से एक वोट तो खुद पार्टी उम्मीदवार अनामिका सिंह का है। जबकि बसपा का सदस्य पद के चुनाव में 11 सदस्यों के जीत दर्ज करने का दावा है। यही नहीं इनमें से कई सदस्यों के चुनाव के दौरान तो बसपा के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्वमंत्री मंझनपुर विधायक इंद्रजीत सरोज ने जनसभा तक की थी। फिर भी अध्यक्ष पद के चुनाव में 11 में 4 सदस्यों का पार्टी को साथ मिला। मामले में बसपा नेता सत्तापक्ष का चुनाव बताकर चुप्पी साधे हुए हैं।
कौशाम्बी को नीले झंडे का गढ़ माना जाता है। पिछले दो दशक से यहां की राजनीति बसपा के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। आलम यह रहा है कि विधानसभा में कभी यहां की तीनों सीटों पर बसपा के ही विधायक बनते थे। समाजवादी पार्टी तो सूबे में यहां सबसे कमजोर बनी हुई थी। सपा की बदहाली का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में जब प्रदेशभर में साइकिल की धूम देखने को मिली थी।
तब भी यहां समाजवादी पार्टी खाता नहीं खोल सकी थी। मंझनपुर, चायल, सिराथू तीनों सीट पर यहां सपा के उम्मीदवार हार गए थे और बसपा ने मंझनपुर, चायल सीट बरकरार रखी थी। वहीं, बदले समीकरण में बसपा जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में न सिर्फ हारी है। बल्कि, वह अपने समर्थित सदस्यों को भी साथ नहीं रख सकी है। यही कारण है कि जिपं अध्यक्ष पद के चुनाव में 29 सदस्यों में से 25 ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान किया। जबकि 11 समर्थित सदस्यों का दावा करने वाली बसपा के पाले में सिर्फ 4 सदस्य ही नजर आए। जबकि बसपा के बारे में कहा जाता है इसके नेता, समर्थक और कार्यकर्ता पार्टी के प्रति समर्पित होते हैं। पर, यह सारा दावा जिपं अध्यक्ष पद के चुनाव के समय तार-तार होता नजर आया।