पीतल नगरी अर्थात शमसाबाद कौशाम्बी की शान थी। यहां के 127 कारखानों में बनने वाले बर्तन देश के कोने-कोने में जाते थे। अब इसकी चमक धूमिल होने लगी है। सुविधा न मिलने से यह कारोबार खत्म होने के कगार पर है। मौजूदा समय आठ कारखाने बचे हैं। कच्चे माल की कमी और बिजली की अव्यवस्था ने इस कारोबार को चौपट कर दिया है। दूसरों को रोजगार देने वाले आज खुद के लिए रोजगार की तलाश में है। चुनाव अपने चरम पर है, लेकिन यह मुद्दा न तो नेता उठा रहे हैं, न ही उनके एजेंडे में है। इससे यहां के लोग क्षुब्ध हैं। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि इस नगरी को खोया हुआ स्थान दिला सकते हैं, लेकिन पहल ही नहीं हो रही है।
शमसाबाद में पीतल के बर्तन बनाने के एक दर्जन कारखाने हैं। 20 साल पहले शमसाबाद की अपनी एक पहचान हुआ करती थी। देश के कोने-कोने से कारोबारी आकर यहां के बर्तनों को ले जाते थे। नक्कासी व चमक के लिए यहां के बर्तन मशहूर थे। 127 कारखानों में रात-दिन यहां काम चलता था। सात से आठ सौ लोग लोग यहां काम करते थे। कच्चा माल मिलना बंद हुआ तो कारखानों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा। कच्चे माल की कमी के कारण कारखाने खत्म हो गए।
इस गांव में अब मात्र आठ कारखाने बचे हैं, वह भी किसी तरह चल रहे हैं। कच्चा माल मंगाने के लिए यहां के कारोबारियों को भटकना पड़ रहा है। जिसका परिणाम यह रहा कि कारखाने तो हैं, लेकिन अब काम नहीं हो रहा है। कारोबारियों का कहना है कि कच्चा माल मिल नहीं रहा है। किसी तरह वह मंगाते हैं तो बिजली की आपूर्ति समस्या खड़ी कर देती है। बिजली न मिलने से कारीगर दिन भर बैठे रहते हैं। कारोबारियों का कहना है कि अभी भी कारखाने अपनी दोबारा खोई रंगत में आ सकते हैं, बशर्ते सुविधा मिलने लगे। पहले के चुनावों में नेताओं ने इस नगरी को सजाने व संवारने की बात की, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नही किया, जिससे यहां के कारोबारियों को राहत मिल सकती। सभी वादे हवा-हवाई ही साबित हुए। अबकी यहां के लोगों को उम्मीद थी कि बढ़ती बेरोजगारी को देखते हुए जनप्रतिनिधि इसे मुद्दा बनाएंगे, लेकिन नेताओं ने इसे अब तक बिसरा रखा है।