चायल। खरीफ की फसल धान, अरहर और मिर्च में कीट और फफूंद के बाद अब केले की फसल में भी पनामा रोग (फ्यूजेरियम विल्ट) लगने लगा है। इस रोग से केले का पौधा पीला पड़ने लगता है, अंत में सड़-गलकर गिरने से नष्ट हो जाता है। इससे केले की खेती करने वाले किसान चिंतित हैं। 1997 में ऑस्ट्रेलिया के डार्विन क्षेत्र में पनामा रोग का सबसे पहले पता चला था।
इस साल मौसम में परिवर्तन, तूफान, ओलावृष्टि और अतिवृष्टि के चलते किसानों को केले की खेती में काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी क्रम में पनामा रोग भी है, जिसके चलते जवाहरगंज के कृषक बबुन्ना सिंह के खेत में केले के पौधे सड़-गलकर गिर गए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि केला बेचकर वह बैंक ऋण जमा कर सकेंगे। लेकिन फसल बर्बादी से उनके अरमानों पर पानी फिर गया है।
उन्होंने बताया कि अचानक 70 फीसदी पाैधे सड़-गलकर नष्ट हो गए हैं। अब वह सड़ें पाैधे को खेत से बाहर करने में जुटे हैं। गांव के ही किसान फतेह बहादुर सिंह ने बताया कि पत्तियां पीली और काली हुईं, फिर पौधों का तना सड़-गल गया। ऐसे में आसपास के किसानों को डर है कि यह रोग उनकी फसल को भी चपेट में न ले ले।
केला एक जिला-एक उत्पाद प्रोत्साहन सूची में भी है शामिल
कृषि विभाग के आकड़ों के मुताबिक जनपद में नकदी फसल के रूप में करीब छह हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में केले की खेती की जाती है। केले को एक जिला-एक उत्पाद की प्रोत्साहन सूची में काैशाम्बी के लिए शामिल किया गया है। ऐसे में उद्यान विभाग खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषकों को महाराष्ट्र के जलगांव समेत अन्य प्रदेशों में प्रशिक्षण के लिए भेजता है। अनुदानित राशि पर टिशू कल्चर (केले का पौधा) भी उपलब्ध कराता है। केले के उत्पादन से कृषक भी आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं।
लक्षण-संक्रमण : औजार और कृषकों के पैरों से भी फैलता है रोग
-पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, डंठल मुड़ने लगते हैं।
-शूट बोरर (तने के अंदर घुसने वाला कीट) से भी पौधे सड़कर गिरने लगते हैं।
-रोग पोषक तत्वों और जल परिवहन को अवरुद्ध कर देता है।
-अंत में पूरा पौधा नष्ट हो जाता है।
-यह रोग फैल गया तो दशकों तक भूमि में जीवित रहता है।
एक से दूसरे खेत में मिट्टी, सिंचाई, फावड़ा ही नहीं कृषकों के पैरों से भी फैलता है।
पनामा रोग फ्यूजेरियम ओक्सीपोरम फफूंद की प्रजाति है। अधिक तापमान होने पर यह रोग तेजी से फैलता है। आईसीएआर के वैज्ञानिक इस रोग पर शोध कर रहे हैं। फिलहाल फ्यूजीकांट दवा काफी हद तक इस रोग के नियंत्रण पर कारगर साबित हो रही है।डाॅ. मनोज सिंह, कृषि वैज्ञानिक- कृषि विज्ञान केंद्र, महगांव