ओडीएफ अभियान सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित है। अभियान का मानक ओडीएफ हो चुके एक भी गांव में पूरा नहीं हो सका है। 31 दिसंबर तक जिले को ओडीएफ करना था। जैसे-जैसे तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे इस अभियान को लेकर अफसरों की परेशानी बढ़ने लगी है। तमाम प्रयास के बाद भी ग्रामीणों के हाथ से लोटा नहीं छूट सका।
मौजूदा सरकार ने जिले को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लिए 31 दिसंबर तक का लक्ष्य निर्धारित किया है। लक्ष्य का निर्धारण होने के बाद डीएम मनीष कुमार वर्मा के नेतृत्व में पंचायती राज विभाग की टीम कड़ी मशक्कत कर रही है। डीपीआरओ कमल किशोर के अलावा अन्य विभागाध्यक्षों द्वारा लोगों को खुले में शौच न जाने और शौचालय बनवाने के लिए मार्निंग फालोअप के जरिए प्रेरित किया जा रहा है। अफसरों के समझाने के बावजूद लोगों के मन मस्तिष्क में खुले में शौच न करने की बात समझ में नहीं आ रही है। गांवों में शौचालय का निर्माण कराने और मार्निंग फालोअप करने के बाद अफसर यह मान बैठते हैं कि ग्रामीण अब खुले में शौच नहीं जा रहे हैं।
उस गांव को कागजों में ओडीएफ घोषित कर दिया जा रहा है, लेकिन ग्रामीण हैं कि वह मानने को तैयार ही नहीं है। सुबह हो या शाम उनके हाथों से लोटा नहीं छूट रहा है। बानगी के तौर पर ओडीएफ हो चुके कड़ा ब्लॉक के अफजलपुर सातौं गांव को लिया जा सका है। इस ग्राम सभा में 571 शौचालय का निर्माण कराकर पूर्ण रूप से ओडीएफ किया जा चुका है। बावजूद इसके ग्रामीण खुले में शौच जाना नहीं बंद कर रहे हैं। इससे साफ है कि शासन का करोड़ों रुपया प्रशासन भले ही खर्च करते हुए शौचालयों का निर्माण करा दे पर जिले के ग्रामीणों को खुले में शौच से रोक पाना टेढ़ी खीर है।