कौशाम्बी ब्लॉक के मजदूरों का मनरेगा से विश्वास उठ चुका है। मई माह में काम करने का भुगतान आठ माह बाद मिला जरूर, लेकिन आधा-अधूरा। मजदूरी मिलने के बाद अब जॉब कार्डधारक मजदूर मनरेगा में काम करने से कतराने लगे हैं। इससे सौ दिन का रोजगार देने का दावा थोथा साबित हो रहा है। काम न मिलने से ब्लॉक क्षेत्र के मजदूर गैर जनपद पलायित होने लगे हैं।
विकास खंड कौशाम्बी की 57 ग्राम सभाओं में जॉब कार्ड धारक मजदूरों की संख्या 36 हजार 326 है। वर्ष 2016 के मई माह में कोसम खिराज, कोसम इनाम, मढ़ी, गोंइठा, गुरौली सहित 80 फीसदी ग्राम सभाओं में जॉब कार्डधारकों ने मनरेगा के तहत काम किया था। काम करने के बाद भी इन मजदूरों की मजदूरी शासन से नहीं आई। मजदूरी के लिए जॉब कार्डधारक आए दिन ब्लॉक व मुख्यालय का चक्कर काटते रहे पर कोई सुनवाई नहीं हो सकी। इसके चलते मजदूर भुखमरी की कगार पर पहुंच गए। इधर जनवरी वर्ष 2017 में ऑनलाइन फीड किए गए मस्टर रोल के हिसाब से शासन ने मजदूरी सीधे खातों में भेजी।
जानकारी होने पर मजदूरों ने अपने खातों से रकम निकाल ली, लेकिन अब वह मनरेगा के तहत काम करने को तैयार नहीं है। ग्राम प्रधान कोसम खिराज अशोक गौतम ने बताया कि गांव में मनरेगा के काम का इस्टीमेट तैयार है, लेकिन देर से हुए पेमेंट को लेकर मजदूरों में नाराजगी है। कोसम इनाम के प्रधान शिवपूजन यादव ने बताया कि कुछ मजदूरों का रुपया अभी तक नहीं आया है। ऐसे में लोग काम करने के लिए तैयार नहीं हैं। गोइंठा ग्राम प्रधान सूर्यबली ने बताया कि ऑनलाइन मस्टर रोल फीडिंग के बाद भी खाते में रुपया नहीं आया है, जबकि फीडिंग को महीनों बीत चुके हैं। आए दिन मजदूर भुगतान कराने को लेकर हो-हल्ला कर रहे थे। ऐसे में अब मनरेगा का काम कराने की हिम्मत नहीं पड़ रही है। गुरौली ग्राम प्रधान मीना सिंह का कहना है कि समय पर भुगतान न होने के कारण मनरेगा से मजदूरों का मोह भंग कर चुका है। स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो मजदूरों का मिलना मुश्किल हो जाएगा। अशोक गौतम ने बताया कि भुगतान में देरी के चलते जॉब कार्ड धारक रोजी रोटी के चक्कर में गैर प्रांत और जनपद चले गए हैं। गांव में काम कराने के लिए एक भी मजदूर नहीं है।
स्टीमेट पास होने का भी संकट
पिछले साल ग्राम सभाओं में मनरेगा से कराए गए कार्यों का भुगतान शासन स्तर से लंबित हो गया था। मजदूर आए दिन ग्राम प्रधानों पर भुगतान के लिए दबाव बना रहे थे। यहां तक कि मजदूरों के लगातार घर आने पर ग्राम प्रधानों ने उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी थी। भुगतान न होने पर ग्राम प्रधानों ने मनरेगा का पहले तो प्रस्ताव ही नहीं बनाया। यदि किसी ने प्रस्ताव तैयार कराया तो उसका स्टीमेट ही नहीं बन सका। ऐसे में मजदूरों को काम दे पाना भी मुश्किल हो रहा है।
वर्ष 2016 में काम करने वाले मजदूरों का लाखों रुपये भुगतान के लिए शासन स्तर पर लंबित था। जनवरी माह में मजदूरों के रुपये उनके खाते में भेजा गया है। जिनका बाकी है, उनको चुनाव के बाद भुगतान कराया जाएगा।
गजेंद्र कुमार तिवारी, डीसी मनरेगा