मूरतगंज में लाठी को रंग देते कारीगर। संवाद
मूरतगंज के मशहूर लाठी व्यापार को आधुनिकता की नजर लग गई है। ग्रामीणों के घटते रुझान व बांस लाने में हो रही बेहिसाब दिक्कत ने लाठी बनाने वाले कारीगरों की कमर तोड़ दी है। यह व्यापार तभी तक जिंदा है, जब तक लाठी बनाने वाले बुजुर्ग कारीगर जीवित है। नयी पीढ़ी बमुश्किल दो जून की रोटी जुटाने वाले इस व्यापार से अलग हो गयी है।
एक जमाना था जब लाठी शान व सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती थी। घर के प्रत्येक पुरुष सदस्य के लिए अलग-अलग लाठी होती थी। आसपास के आठ दस जिलों में लाठी की आपूर्ति मूरतगंज से होती थी। लोग मूरतगंज आकर लाठी खरीदते ही थे, साथ ही यहां के लाठी के व्यापारी दूर-दूर लगने वाले ग्रामीण मेलों में भी लाठी बेचते थे।
लाठी के कारीगर महाबीर प्रसाद बताते है कि यह धंधा हम बुजुर्गों तक ही सीमित है। जिस घर में बुजुर्ग जीवित है, वहां तो लाठी बनती है। जहां अब बुजुर्ग नहीं रहे वहां कारोबार भी नहीं रहा।
मूरतगंज की बनी लाठी की जिले में तो काफी मांग होती थी। इसके साथ प्रतापगढ़, फतेहपुर, प्रयागराज, बांदा व चित्रकूट जिले तक के लोग यहां की बनी लाठी को पसंद करते थे। वहां लगने वाले देहाती मेलों में जाकर लाठी बेचकर ही गुजारा होता है। - राम नारायण
पहले हम जिले की मनौरी, सरायआकिल, भरवारी आदि प्रमुख कस्बों में लगने वाली साप्ताहिक बाजार में लाठी बेचने जाते थे। अब बाजारों में लाठी की बिक्री ही नहीं होती, इसलिए जाना ही बंदकर दिया है। - शिव मोहन
मूरतगंज में लाठी को रंग देते कारीगर। संवाद