नोटबंदी के बाद बैंकों की छुट्टी ने लोगों को पाई-पाई का मोहताज कर दिया है। लोगों की जेब में रुपये नहीं हैं। जरूरत की चीजाें के लिए उन्हें हाथ फैलाना पड़ रहा है। इससे परेशान लोग अब खुलकर इस व्यवस्था के खिलाफ बोलने भी लगे हैं। सबसे ज्यादा परेशान मजदूर तबका है। सरकारी व निजी सभी तरह के निर्माण कार्य बंद हो चुके हैं, इससे लोगों को काम नहीं मिल पा रहा है।
जिले में रोज खाने-कमाने वालों की एक लंबी जमात है। मौजूदा समय यह जमात पाई-पाई को मोहताज है। मजदूर तबका कई दिनों से घर बैठा है। इसकी सबसे बड़ी वजह जनपद में अधिकांश निर्माण कार्य बंद हो चुके हैं। सरकारी हो अथवा निजी। ठेकेदारों ने मजदूरों से मुंह फेरना शुरू कर दिया है। इससे मजदूर तबका के सामने खाने-पीने का संकट खड़ा हो गया है। पूरामुफ्ती के एक भट्ठे की शिकायत इसी को लेकर थी। भट्ठा मालिक ने छत्तीसगढ़ के मजदूरों को तो बुला लिया था, लेकिन वह मजदूरों को खुराकी भी नहीं दे पा रहा है। इसकी शिकायत एसपी से हो चुकी है। यही हाल विकास भवन के समीप रहने वाले मजदूर संपत का है। मजदूरी कर वह परिवार का भरण पोषण करता है।
फिलहाल उसके घर का राशन खत्म है। मोहल्ले के एक व्यक्ति से नगदी रकम उन्होंने मांगी है। बैंक खुलने के बाद ही रुपया देने का वादा किया गया है। संपत जैसी स्थिति अर्जुन सरोज की है। ओसा के रहने वाले अर्जुन को कई दिनों से काम नहीं मिला है। अर्जुन मंझनपुर में रविवार को एक परिचित दुकानदार से उधार सामान मांगने आया था। दुुकानदार ने स्थिति का हवाला देते हुए सामान देने से ही इंकार कर दिया। वह मन मसोस कर अपने घर चला गया। मजदूरों से इतर सरकारी कर्मचारियों की भी स्थिति ठिक नहीं है। वह भी रुपये के लिए परेशान हैं। एटीएम में कैश नहीं है। इससे वह अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। कृषि विभाग के वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश दो दिन से रुपया निकालने के लिए एटीएम का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन एटीएम ही खाली है। डॉ. अखिलेश ने बताया कि उधार लेकर किसी तरह काम चला रहे हैं।