कांपते हाथों में पांच सौ व एक हजार की नोट थी। उम्र का ऐसा पड़ाव है कि उठने-बैठने के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। लक्ष्मी हाथ में थी, फिर भी गृहलक्ष्मी को बचाने की जद्दोजहद 75 वर्षीय रामभजन कर रहे थे। मर्ज ही ऐसा है कि सुनकर लोगों की रूह कांप जाए। कैंसर पीड़ित पत्नी के इलाज के लिए रामभजन करारी के यूनियन बैंक आए थे, लेकिन रुपया नहीं मिला तो वह रो पड़े, उनके साथ वह लोग भी आंसू बहाने लगे जो उनके गम से वाकिफ हो चुके थे।
करारी के गुलामीपुर निवासी रामभजन 75 वर्ष के हैं। खेती-किसानी करके उन्होंने अपने परिवार को इस मुकाम तक पहुंचाया है कि वह आज खेती के जरिए बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। हाल ही में उनकी पत्नी शिवकली की तबियत खराब हो गई। शिवकली को कैंसर है। इलाहाबाद के चिकित्सकों ने जवाब दे दिया तो उनको लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज चल ही रहा था कि मोदी सरकार के फैसले की ऐसी मार पड़ी कि रुपया होते ही भी शिवकली को अस्पताल से निकाल दिया गया। रामभजन का बड़ा बेटा मां को लेकर घर आ गया, जहां वह जिंदगी और मौत से जूझ रही है। रामभजन शनिवार को यूनियन बैंक की शाखा करारी में चार हजार रुपया बदलवाने गए थे।
किसी तरह वह बैंक के अंदर घुसे, तो भीड़ देख एक कोने में बैठ गए। उनके साथ आया पोता रोहन काउंटर तक पहुंचने का प्रयास करता रहा, लेकिन वह भी असफल रहा। दो घंटे बीत गए लेकिन नोट नहीं बदली जा सकी तो रामभजन फफक-फफक कर रो पड़ा। अचानक लोगों की निगाह उसकी ओर गई तो लोगों ने यह जानने की कोशिश की। आखिर वह रो क्यों रहे हैं। हकीकत पता चली तो सुनने वालों का भी कलेजा चाक हो गया। रामभजन के हाथ में एक हजार व पांच सौ की नोट देख लोगों में गुस्सा भी दिखा, लेकिन कोई कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं था। आखिरकार बिना नोट बदले वृद्ध को वापस ही जाना पड़ा।